शहर में दीपावली न मना सकूंगा शहर को जाते, मां के पैर छूते हुए उन्हें कहता कि अच्छे से रहना और अपना ख्याल रखना। जबकि बतौर जवान बेटा इन बातों की जिम्मेदारी मेरी ही है। अक्सर करियर की राहें हमें अपने घर-परिवार से दूर ले जाती है। इन त्यौहार के मौसम में शहर में रहते हुए दूर अपने घर-परिवार में मनाए त्यौहारों की याद मन में बहुत कौंधती है।
दीपावली हमारे लिए महापर्व है। आज जब मैं शहर में हूं तो यहां भी दीपावली के लिए घर की सफाई हो रही है। त्यौहार का माहौल बनना शुरू हो जाता है। महानगरों से इतर छोटे कस्बों में रहने वाले मध्यमवर्गीय परिवार दीपावली के लिए अपने कच्चे-पक्के से घर की सफाई कर उसकी खूबसूरती बढ़ाने में जुट जाते हैं। ऐसे परिवारों में घर की सफाई, पुताई, सजावट से लेकर पकवान बनाने तक के सारे काम परिवार के सदस्य मिलकर करते हैं। त्यौहार की तैयारियों की पड़ोसियों से चर्चा होती है। उनमें तैयारियों को पूरा करने को लेकर एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी होती है। ये सब होने के बाद त्यौहार
पूरे मोहल्ले में मिलकर मनाया जाता है। शहर में बात ऐसी नहीं नहीं होती है। यहां आप पड़ोसी को ठीक से जानते भी नहीं है। अपने घर में ही त्यौहार मना लेते है।
मैं शहर के एक मकान में किराए से रह रहा हूं। महीनों हुए यहां रहते लेकिन मैं नीचे की मंजिल पर रहने वाले मकान मालिक का नाम तक नहीं जानता हूं। उन्होंने भी कभी मुझसे मेरा नाम तक नहीं पूछा। आज मैंने मकान मालिक के खेलते बच्चे से उसका नाम पूछ ही लिया। उसके बाद महसूस हुआ कि मैं यहां शहर में दीपावली न मना सकूंगा। बस, जल्द ही घर जाना हो जाए और मम्मी-पापा का दीपावली की तैयारियों में हाथ बंटाऊं। ऐसे शहर में मानवीय रिश्तों की शून्यता के बीच दीपावली नहीं मना सकता। अपने कस्बे लौटकर घर पर मिट्टी के दीए में घी से दीप जलाकर दीपावली मनाउंगा। यहां शहर में मोमबत्ती जलाकर दीपावली क्या मनाना।

























