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Sunday, November 6, 2011

हलवा-केक याद आता है


(*मेरे जन्मदिवस पर विशेष!)
 मेरा जन्मदिन कई दफा दीपावली के दौरान आता है। हमारे मध्यवर्गीय परिवार में सारे सदस्य मिलकर घर की सफाई-पुताई और बाकी तैयारियां करते हैं। दीपावली से दो-तीन दिन पहले हम सब घर की पुताई में जुटे हुए थे। उस दिन मेरा जन्मदिन था और किसी को याद नहीं था। पिछले दफा भी दीपावली की तैयारियों में सभी मेरा जन्मदिन भूल गए थे। रात हो गई और किसी को मेरा जन्मदिन याद नहीं आया। मैं भी पुताई के काम में लगा रहा।
रात करीब साढ़े दस बजे क्या देखता हूं कि मेरी बड़ी बहन ने मुझे दूसरे कमरे में पुकारा। मैं पुताई का काम रोक उस कमरे में गया,तो देखता हूं कि आटे का गरम-गरम हलवे को एक प्लेट में रखकर केक का आकार दे दिया गया है। इसके बीच में एक बड़ी और मोटी से मोमबत्ती जल रही थी।
दीदी और मम्मी ने कहा कि,अरे तेरा जन्मदिन ही ऐसे समय में आता है कि हम दीपावली की तैयारियों में जन्मदिन भूल ही जाते हैं। अभी याद आया तो हमने तेरे लिए ऐसा केक बनाया। मेरा मन भर आया और आंखें नम हो गई। जुबां से थोड़े देर तक शब्द ही नहीं निकले। खुशी के आंशुओं से डबाडब आखें मैंने कहा कि पिछली बार भी आप लोग मेरा जन्मदिन भूल गए थे।
मैंने बड़ी खुशी से ‘हलवा-केक’ कांटा। उस दिन को आठ साल हो चुके हैं। मेरा आठ जन्मदिन भई आए लेकिन कभी केक कांटना नहीं हुआ। इस 14 अक्तूबर मेरा जन्म आया/आ रहा है और मुझे मम्मी और दीदी का बनाया केक बहुत याद आया/आएगा। ‘हलवा-केक’ काटे 9 साल पूरे हो जाऐंगे/गए। आज भी जब वो जन्मदिन याद आता है तो भावुक हो जाता हूं। जाने अब कब दीपावली में घर की पुताई करते हुए ‘हलवा-केक’ काटना नसीब होगा।


Friday, February 18, 2011

देश भर की नदियों का पानी..


महानगर की आपाधापी वाली जिंदगी से कुछ मिनटों की दूरी पर। गोबर से लिपी दीवारें, उनके ऊपर घास-फूस के बने छप्पर, लोक गीतों की धुनों और ढोलक की थाप पर थिरकते कदम के साथ चौपाल में देशी सांस्कृतिक के कार्यक्रम भी। ऐसा लगता है मानो हिन्दुस्तान की आंचलिक और लोक संस्कृति जीवन्त हो, बोल उठी हो। यह दृश्य किसी गांव का नहीं बल्कि दक्षिणी दिल्ली से सटी अरावली पहाड़ियों की कंदराओं में बसे सूरजकुंड के ऐतिहासिक मेले का है। यह मेला ऐसा है जो देश-विदेश की सांस्कृतिक गतिविधियों को मंच प्रदान करता है।
यहां समूची भारतीय संस्कृति का विश्व संस्कृति से होता मिलन, दुनिया के देशों की आपसी सीमाओं और उन पर उपजे तनाव को बेमानी साबित कर रहा था। वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को सामने देखना एक सुखद पल था। मेले में लगे विभिन्न राज्यों के स्टॉल भारत की हस्तशिल्प विरासत का झरोखा दिखा रहे थे। साथ ही संपूर्ण भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में पिरोने के गवाह भी बन रहे थे। आंध्र प्रदेश की मुख्य थीम पर फरीदाबाद में सजा सांस्कृतिक सूरजकुंड मेला लगातार 25वें वर्ष हमारे बीच है।
ऊबड़-खाबड़ जमीन पर मिट्टी से लीपी गई झोपड़ियों के बीच रंग-बिरंगे परिधानों में घूमते लोक-कलाकार। ये एक छोटा भारत होने का भ्रम पैदा करते हैं। यही खासियत है हरियाणा के लिए अकेले साठ फीसदी राजस्व पैदा करने वाले सूरजकुंड मेले की। यहां आप मराठी धुनों पर थिरक सकते हैं, आंध्र की रामायण मण्डली को सुन सकते हैं साथ ही आइडैंटिटी कार्ड लटकाए रावण के साथ फोटो खिंचवा सकते हैं। आप अगर खाने के शौकीन हैं तो गुजराती खाखरा के साथ के साथ कुल्हड़ वाली चाय और राजस्थान की दाल-बाटी-चूरमा चट करने के बाद मटका कुल्फी का मजा ले सकते हैं।
अपने 25वें बसंत के इस अनूठे मेले की थीम है आंध्रप्रदेश। हैदराबाद, विजयबाड़ा और वारंगल से सौ से अधिक दुकानों ने राज्य के हस्त शिल्प मूर्तिकला और लजीज पकवानों से लोगों का मन मोह रहे थे। साथ ही वहां से आई कला मंडलियों ने मेले में घूम-घूमकर मेला-आगंतुकों को वहां की परंपरा एवं लोक-कलाओं से लोगों का परिचय करवाया। आगंतुकों के लिए राज्य का प्राचीन डप्पू डोस और तड़प गिल्लू नृत्य आकर्षण का केंद्र बने रहे। तेलगू भाषा से अनजान होते हुए भी उत्तर-भारतीय दर्शकों को इन कलाकारों ने अपनी भाव-भंगिमाओं और अनूठी प्रस्तुति से बांधे रखा। 
आंध्रप्रदेश पर्यटन विभाग के सहायक निदेशक जी0 राम कुट्टैया और हरियाणा सरकार के पर्यटन मंत्री ओम प्रकाश जैन मेले की सफलता को लेकर खासे उत्साहित हैं। मेले के प्रभारी राजेश जून ने बताया कि कई मामलों में यह मेला अन्य मेलों से अलग है। देश और विदेश से आये विभिन्न सैलानी पूरे भारतवर्ष की सांस्कृति छंटा को एक साथ, एक मंच पर देख सकते हैं। रामाकुट्टैया का कहना है कि इस मेले में आंध्रप्रदेश की सभ्यता, संस्कृति और ग्रामीण परिवेश को उकेरा गया है। जिसमें आंध्रप्रदेश के शाकाहारी लजीज पकवान बड़ा हिस्सा अदा कर रहे है।
दरअसल यह मेला और हस्तशिल्प दोनों एक दूसरे के पर्याय जैसे ही हैं। जिससे यह मेला अपनी रचनात्मक हस्तशिल्प सामग्री के लिए विख्यात है लेकिन पिछले कुछ सालों से हस्तशिल्प खरीददारी के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है। मेले में मधुबनी चित्रकारी की एकमात्र दुकान सजाए बैठी गीता देवी पिछले छह साल से लगातार अपनी चित्रकारी के साथ मेले में शामिल होती हैं। वे कहती हैं- आई काइल लोग सब चित्रकारी के बजाय त् खूब करै छतिन् पर कोए खरीदे नय छै। (आने वाले लोग चित्रकारी की बढ़ाई तो खूब करते है पर कोई खरीदता नहीं है।) पहले से आब खर्चा बढ़ गैले ये तै लेके दामों बढ़ गैले थे।(खर्च अब पहले से बढ़ गया है इसलिए दाम बढ़ गए थे।) आब कि कहब बाबू बड़ाय से पेट ते नहिये भरै छै।(अब क्या कहे बाबू बढ़ाई से तो पेट नहीं भरता है)
वहीं दूसरी तरफ उजबेकिस्तान से आयी लीजा पहली बार भारत आकर बहुत खुश हैं। अब तो यहॉ उनके काफी दोस्त भी बन गए हैं। लीजा की तरह उनकी सहेलियों को भी भारत की संस्कृति में अपनापन महसूस होता है। सात तरह की संस्कृतियों का एक ही नृत्य में मिल जाना उजबेकिस्तान की सांस्कृतिक समृद्धता को दर्शाता है। मेले में उजबेकिस्तान आयोजन में भागीदार है इसके अलावा विभिन्न देश अपनी-अपनी कला संस्कृति की छटा बिखेरने मेले में आये हुए हैं। देशी और विदेशी संस्कृति के मिलन से इस मेले में चार चांद लग गए है।
इसी तरह सार्क देशों के स्टॉलों के बीच हस्तकृतियों की खुबसूरती को निहारती, जर्मनी से आई जेनिफर ने सूरजकुंड मेले को इनक्रिडिबल और वन्डरफुल जैसे शब्दों में बयां किया। उनका कहना था कि मैं भारत पहली बार आई हूं, लेकिन इस मेले में आकर भारत की अद्भुत संस्कृति और कला को देखकर अब मुझे लग रहा है कि मानों मैं भारत को बहुत करीब से जानती हूं। इसी संबंध में पिछले दस सालों से यहां आ रहे दिल्ली के सुरेश का कहना है कि रजत वर्ष होने के अवसर पर मेले में इस बार एक अलग ही नजारा है। इस बार सुरक्षा और पार्किंग की व्यवस्था भी पिछले सालों से बेहतर है। उनता यह भी कहना है कि मेला हस्तशिल्पियों को अपनी कला को प्रदर्शित करने का एक बेहतरीन मंच देता है।
झोपड़ियों जैसी दुकान राजस्थानी जूतियों से सजी है। खरीददारों की भीड़ के बीच दुकानदार एक साथ कई लड़कियों को जूतियों की कारीगरी और भाव बता रहा है। ज्यादातर ग्राहक आ रहे हैं,  दाम पूछ रहे हैं और आगे के स्टॉल की तरफ रुख कर ले रहे हैं। खरीदने वाले बहुत कम है। राजस्थान के दूरदराज के गांव से जूतियां बेचने आए विक्रम कहते है ‘‘ मैं पांच सालों से यहां दुकान लगा रहा हूं। ज्यादातर लोग आते हैं और मोलभाव कर चले जाते हैं जबकि शहर की बड़ी दुकानों में लोग इन्हीं जूतियों के लिए हंसी-खुशी कहीं ज्यादा रकम अदा करते हैं।
जहां एक ओर सूरजकुण्ड मेला विभिन्न राज्यों कर दुकानों से सजा था वहीं दूसरी ओर यहां पर भ्रमण करने वाले दर्शकों का उत्साह भी चरम पर था। दो सालों से सूरजकुण्ड मेला में आ रहे गाजियाबाद के कुलदीप सिंह कहते है कि इस बार बांस से बने हस्तशिल्प के सामानों में ज्यादा विविधता नजर आई। वहीं फरीदाबाद की गुंजन को मेले का आकर्षण दक्षिण भारतीय व्यंजनों का रोचक स्वाद लगा। वहीं विदेशी पर्यटकों ने में सूती कपड़ों की जमकर खरीददारी की। स्वीडन की अमांडा लुकास  कहती है कि इस मेले में पूरे भारत की झलक देखने को मिलती है। मैंने यहां पर सूती के कपड़ों की खरीददारी की जो हमारे देश में नहीं मिलता है। साथ ही बांस से निर्मित कई घरेले सामानों की खरीददारी की जिनके मूल्य काफी सामान्य ही लगे।
सारे देश के शिल्पकार यहां मौजूद हैं,  मानो देश भर के प्रांतों का पानी इस सूरजकुंड में हो पर यहां पचास रूपये की एक जलेबी भी है। आमलोगों को मेले में घूमना तो भा रहा है पर यहां भी मंहगाई डायन उनकी नाक में दम कर रही है। इस पर मेला प्रबंधन समिति के अधिकारी निरंजन दास कहते है कि यह सही है कि यहां चीजे काफी मंहगी हैं। देश के दूरदराज क्षेत्रों से शिल्पकार यहां हस्तशिल्प लेकर आए हैं। इन चीजों के दाम में बड़ा हिस्सा परिवहन खर्च का है जो चीजें मंहगी होने की बड़ी वजह है। श्री दास फिर भी मानते है कि हस्तशिल्प के कद्रदान ज्यादा दाम चुकाकर भी चीजें खरीदते है। हर आगंतुक खरीदारी न भी करे पर इस मेले में उन्हे देश की शिल्प कला और संस्कृति के दर्शन हो रहे हैं। यहां मनोरंजन के लिए भी बहुत कुछ है। इस तरह यहां हर आगंतुक के लिए कुछ न कुछ जरूर है। मेले में आए लोग पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था से भी संतुष्ट दिखे। चप्पे-चप्पे पर कैमरे और पुलिसकर्मी है। प्रबंधन समिति ने एक उद्घोषणा केन्द्र भी बनाया जो आगंतुकों और दुकानदारों के लिए सहयोगी साबित हो रहा है।
मेले की इस चहलकदमी के दूसरी ओर सीड़ियों की शक्ल में झील के लिए चाहारदीवारी बनाकर सटाएं गऐ सफेद-पीले और काले पत्थरों के बीच झील सूख चुकी है। सूखी झील में बरसात के पानी ने अटककर जो छोटी-छोटी झीलें बनाई हैं,  वहां बच्चों का एक झुंड कागज की नावें चला रहा है। हवा ठहरे पानी में धीमे-धीमे नावों को ढकेलती है। वक्त ने ऐसे ही सूरजकुण्ड के इस मेले को पिछले पच्चीस सालों से आगे बढ़ाया है। अगले साल फिर से लोगों को इस मेले का इन्तजार रहेगा और इसका भी कि ये मेला अपना स्वर्ण वसंत भी पूरा करे।
 

Friday, January 7, 2011

जिन्दगी है मॉं

डॉ. सोना सिंह, इन्दौर

दूसरे जीवन को जन्म देना एक ईश्वर की तरह है। मॉं बनना किसी भी औरत का दूसरा जन्म होता है। लेकिन इस दूसरे जन्म के बारे में कितनी महिलाएं वैसे ही सोच पाती है जैसा महान उसे माना जाता है। जन्म देने के लिए होने वाली पीड़ा और यातना सहकर भी एक तप की तरह इस कार्य के लिए खुद को तैयार करना मात्र संतति उत्पत्ति नहीं है।
कहते है कि मॉं भूखी रहकर भी बच्चे का ध्यान रखती है। वह खुद सोना भूल जाती है पर अपने बच्चे को सुलाने में अपनी रातें तमाम करती है। मॉं धरती पर भगवान का रूप है, यह सिर्फ सुना था। लेकिन मॉं होना और अपने पास मॉं का होना एक ऐसा एहसास है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है जिया जा सकता है। मेरे जीवन में मॉं का स्थान इस बात का विवरण देने की बजाय यह कहना ज्यादा सही होगा कि मेरा जीवन ही मॉं का है। यह एक ऐसा वरदार है जिसे पाना और सहेजकर रखना एक व्रत की तरह है।

आज मैं जीवन के इस सुखद पद को पा चुकी हूं तो लगता है कि मॉं होना मुश्किल है। दूसरे के जीवन को बनाना, उसे इस दुनिया में लाना और फिर उसकी सेहत के बारे में सोचना ही एक काम होता है। मॉं होना दुनिया का एक ऐसा मुश्किल काम है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। आज मदर्स डे पर मैं जबकि खुद मॉं बन चुकी हूं पर अपनी मॉं के बारे में सिवाय सोचने के और कुछ कर नहीं पा रही हूं। स्वयं मॉं बनने पर मुझे एहसास हुआ मेरी मॉं, सास, बहन, भाभी के दर्द का जो मुझे सिर्फ एक मुस्कान के रूप में ही आज तक दिखाई देता रहा है।

क्योंकि मॉं को उपहार देने से, प्यार देने से, ध्यान देने से ममत्व का कर्ज नहीं चुका सकता। इसके लिए मेरे जैसे कितने जीवन लग सकते हैं। ममत्व एक अनुभव है जो सिर्फ जीने पर किया जा सकता है। मैं मदर्स डे पर उन सभी माताओं को भी शत्-शत् प्रणाम करती हॅूं जिन्होंने अपना जीवन अपनी संतानों के लिए होम कर दिया।
(लेखिका देवी अहिल्या विवि में अध्यापिका है)