Journalist by nature. Occasional FBवाला writer, rarely photographer, 6 day designer & one day Bachelor.
Monday, February 28, 2011
Sunday, February 20, 2011
www.mediasaathi.com- मीडिया फ्लॉवर
www.mediasaathi.com पर आया मेरा इंटरव्यू-
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Friday, February 18, 2011
देश भर की नदियों का पानी..
महानगर की आपाधापी वाली जिंदगी से कुछ मिनटों की दूरी पर। गोबर से लिपी दीवारें, उनके ऊपर घास-फूस के बने छप्पर, लोक गीतों की धुनों और ढोलक की थाप पर थिरकते कदम के साथ चौपाल में देशी सांस्कृतिक के कार्यक्रम भी। ऐसा लगता है मानो हिन्दुस्तान की आंचलिक और लोक संस्कृति जीवन्त हो, बोल उठी हो। यह दृश्य किसी गांव का नहीं बल्कि दक्षिणी दिल्ली से सटी अरावली पहाड़ियों की कंदराओं में बसे सूरजकुंड के ऐतिहासिक मेले का है। यह मेला ऐसा है जो देश-विदेश की सांस्कृतिक गतिविधियों को मंच प्रदान करता है।
यहां समूची भारतीय संस्कृति का विश्व संस्कृति से होता मिलन, दुनिया के देशों की आपसी सीमाओं और उन पर उपजे तनाव को बेमानी साबित कर रहा था। वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को सामने देखना एक सुखद पल था। मेले में लगे विभिन्न राज्यों के स्टॉल भारत की हस्तशिल्प विरासत का झरोखा दिखा रहे थे। साथ ही संपूर्ण भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में पिरोने के गवाह भी बन रहे थे। आंध्र प्रदेश की मुख्य थीम पर फरीदाबाद में सजा सांस्कृतिक सूरजकुंड मेला लगातार 25वें वर्ष हमारे बीच है।
ऊबड़-खाबड़ जमीन पर मिट्टी से लीपी गई झोपड़ियों के बीच रंग-बिरंगे परिधानों में घूमते लोक-कलाकार। ये एक छोटा भारत होने का भ्रम पैदा करते हैं। यही खासियत है हरियाणा के लिए अकेले साठ फीसदी राजस्व पैदा करने वाले सूरजकुंड मेले की। यहां आप मराठी धुनों पर थिरक सकते हैं, आंध्र की रामायण मण्डली को सुन सकते हैं साथ ही आइडैंटिटी कार्ड लटकाए रावण के साथ फोटो खिंचवा सकते हैं। आप अगर खाने के शौकीन हैं तो गुजराती खाखरा के साथ के साथ कुल्हड़ वाली चाय और राजस्थान की दाल-बाटी-चूरमा चट करने के बाद मटका कुल्फी का मजा ले सकते हैं।
अपने 25वें बसंत के इस अनूठे मेले की थीम है आंध्रप्रदेश। हैदराबाद, विजयबाड़ा और वारंगल से सौ से अधिक दुकानों ने राज्य के हस्त शिल्प मूर्तिकला और लजीज पकवानों से लोगों का मन मोह रहे थे। साथ ही वहां से आई कला मंडलियों ने मेले में घूम-घूमकर मेला-आगंतुकों को वहां की परंपरा एवं लोक-कलाओं से लोगों का परिचय करवाया। आगंतुकों के लिए राज्य का प्राचीन डप्पू डोस और तड़प गिल्लू नृत्य आकर्षण का केंद्र बने रहे। तेलगू भाषा से अनजान होते हुए भी उत्तर-भारतीय दर्शकों को इन कलाकारों ने अपनी भाव-भंगिमाओं और अनूठी प्रस्तुति से बांधे रखा। आंध्रप्रदेश पर्यटन विभाग के सहायक निदेशक जी0 राम कुट्टैया और हरियाणा सरकार के पर्यटन मंत्री ओम प्रकाश जैन मेले की सफलता को लेकर खासे उत्साहित हैं। मेले के प्रभारी राजेश जून ने बताया कि कई मामलों में यह मेला अन्य मेलों से अलग है। देश और विदेश से आये विभिन्न सैलानी पूरे भारतवर्ष की सांस्कृति छंटा को एक साथ, एक मंच पर देख सकते हैं। रामाकुट्टैया का कहना है कि इस मेले में आंध्रप्रदेश की सभ्यता, संस्कृति और ग्रामीण परिवेश को उकेरा गया है। जिसमें आंध्रप्रदेश के शाकाहारी लजीज पकवान बड़ा हिस्सा अदा कर रहे है।
दरअसल यह मेला और हस्तशिल्प दोनों एक दूसरे के पर्याय जैसे ही हैं। जिससे यह मेला अपनी रचनात्मक हस्तशिल्प सामग्री के लिए विख्यात है। लेकिन पिछले कुछ सालों से हस्तशिल्प खरीददारी के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है। मेले में मधुबनी चित्रकारी की एकमात्र दुकान सजाए बैठी गीता देवी पिछले छह साल से लगातार अपनी चित्रकारी के साथ मेले में शामिल होती हैं। वे कहती हैं- “आई काइल लोग सब चित्रकारी के बजाय त् खूब करै छतिन् पर कोए खरीदे नय छै। (आने वाले लोग चित्रकारी की बढ़ाई तो खूब करते है पर कोई खरीदता नहीं है।) पहले से आब खर्चा बढ़ गैले ये तै लेके दामों बढ़ गैले थे।(खर्च अब पहले से बढ़ गया है इसलिए दाम बढ़ गए थे।) आब कि कहब बाबू बड़ाय से पेट ते नहिये भरै छै।(अब क्या कहे बाबू बढ़ाई से तो पेट नहीं भरता है)।“
वहीं दूसरी तरफ उजबेकिस्तान से आयी लीजा पहली बार भारत आकर बहुत खुश हैं। अब तो यहॉ उनके काफी दोस्त भी बन गए हैं। लीजा की तरह उनकी सहेलियों को भी भारत की संस्कृति में अपनापन महसूस होता है। सात तरह की संस्कृतियों का एक ही नृत्य में मिल जाना उजबेकिस्तान की सांस्कृतिक समृद्धता को दर्शाता है। मेले में उजबेकिस्तान आयोजन में भागीदार है इसके अलावा विभिन्न देश अपनी-अपनी कला संस्कृति की छटा बिखेरने मेले में आये हुए हैं। देशी और विदेशी संस्कृति के मिलन से इस मेले में चार चांद लग गए है।
इसी तरह सार्क देशों के स्टॉलों के बीच हस्तकृतियों की खुबसूरती को निहारती, जर्मनी से आई जेनिफर ने सूरजकुंड मेले को ‘इनक्रिडिबल’ और ‘वन्डरफुल’ जैसे शब्दों में बयां किया। उनका कहना था कि मैं भारत पहली बार आई हूं, लेकिन इस मेले में आकर भारत की अद्भुत संस्कृति और कला को देखकर अब मुझे लग रहा है कि मानों मैं भारत को बहुत करीब से जानती हूं। इसी संबंध में पिछले दस सालों से यहां आ रहे दिल्ली के सुरेश का कहना है कि रजत वर्ष होने के अवसर पर मेले में इस बार एक अलग ही नजारा है। इस बार सुरक्षा और पार्किंग की व्यवस्था भी पिछले सालों से बेहतर है। उनता यह भी कहना है कि मेला हस्तशिल्पियों को अपनी कला को प्रदर्शित करने का एक बेहतरीन मंच देता है।
झोपड़ियों जैसी दुकान राजस्थानी जूतियों से सजी है। खरीददारों की भीड़ के बीच दुकानदार एक साथ कई लड़कियों को जूतियों की कारीगरी और भाव बता रहा है। ज्यादातर ग्राहक आ रहे हैं, दाम पूछ रहे हैं और आगे के स्टॉल की तरफ रुख कर ले रहे हैं। खरीदने वाले बहुत कम है। राजस्थान के दूरदराज के गांव से जूतियां बेचने आए विक्रम कहते है ‘‘ मैं पांच सालों से यहां दुकान लगा रहा हूं। ज्यादातर लोग आते हैं और मोलभाव कर चले जाते हैं जबकि शहर की बड़ी दुकानों में लोग इन्हीं जूतियों के लिए हंसी-खुशी कहीं ज्यादा रकम अदा करते हैं।
जहां एक ओर सूरजकुण्ड मेला विभिन्न राज्यों कर दुकानों से सजा था वहीं दूसरी ओर यहां पर भ्रमण करने वाले दर्शकों का उत्साह भी चरम पर था। दो सालों से सूरजकुण्ड मेला में आ रहे गाजियाबाद के कुलदीप सिंह कहते है कि इस बार बांस से बने हस्तशिल्प के सामानों में ज्यादा विविधता नजर आई। वहीं फरीदाबाद की गुंजन को मेले का आकर्षण दक्षिण भारतीय व्यंजनों का रोचक स्वाद लगा। वहीं विदेशी पर्यटकों ने में सूती कपड़ों की जमकर खरीददारी की। स्वीडन की अमांडा लुकास कहती है कि इस मेले में पूरे भारत की झलक देखने को मिलती है। मैंने यहां पर सूती के कपड़ों की खरीददारी की जो हमारे देश में नहीं मिलता है। साथ ही बांस से निर्मित कई घरेले सामानों की खरीददारी की जिनके मूल्य काफी सामान्य ही लगे।
सारे देश के शिल्पकार यहां मौजूद हैं, मानो देश भर के प्रांतों का पानी इस सूरजकुंड में हो। पर यहां पचास रूपये की एक जलेबी भी है। आमलोगों को मेले में घूमना तो भा रहा है पर यहां भी मंहगाई डायन उनकी नाक में दम कर रही है। इस पर मेला प्रबंधन समिति के अधिकारी निरंजन दास कहते है कि यह सही है कि यहां चीजे काफी मंहगी हैं। देश के दूरदराज क्षेत्रों से शिल्पकार यहां हस्तशिल्प लेकर आए हैं। इन चीजों के दाम में बड़ा हिस्सा परिवहन खर्च का है जो चीजें मंहगी होने की बड़ी वजह है। श्री दास फिर भी मानते है कि हस्तशिल्प के कद्रदान ज्यादा दाम चुकाकर भी चीजें खरीदते है। हर आगंतुक खरीदारी न भी करे पर इस मेले में उन्हे देश की शिल्प कला और संस्कृति के दर्शन हो रहे हैं। यहां मनोरंजन के लिए भी बहुत कुछ है। इस तरह यहां हर आगंतुक के लिए कुछ न कुछ जरूर है। मेले में आए लोग पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था से भी संतुष्ट दिखे। चप्पे-चप्पे पर कैमरे और पुलिसकर्मी है। प्रबंधन समिति ने एक उद्घोषणा केन्द्र भी बनाया जो आगंतुकों और दुकानदारों के लिए सहयोगी साबित हो रहा है।
मेले की इस चहलकदमी के दूसरी ओर सीड़ियों की शक्ल में झील के लिए चाहारदीवारी बनाकर सटाएं गऐ सफेद-पीले और काले पत्थरों के बीच झील सूख चुकी है। सूखी झील में बरसात के पानी ने अटककर जो छोटी-छोटी झीलें बनाई हैं, वहां बच्चों का एक झुंड कागज की नावें चला रहा है। हवा ठहरे पानी में धीमे-धीमे नावों को ढकेलती है। वक्त ने ऐसे ही सूरजकुण्ड के इस मेले को पिछले पच्चीस सालों से आगे बढ़ाया है। अगले साल फिर से लोगों को इस मेले का इन्तजार रहेगा और इसका भी कि ये मेला अपना स्वर्ण वसंत भी पूरा करे।
Tuesday, February 8, 2011
Monday, February 7, 2011
Wednesday, February 2, 2011
Monday, January 31, 2011
Saturday, January 29, 2011
Tuesday, January 25, 2011
Saturday, January 22, 2011
किताबों से सच्ची दोस्ती में खाई
मैं स्कूल में था। टाटपट्टी वाले स्कूल में। जहां टाटपट्टियां भी फटी ही होती थी। मम्मी-पापा ने हिन्दी स्कूल को ही प्राथमिकता दी थी। क्योंकि उस समय वहां आज की तरह अंग्रजी में पढ़ने का ‘चलन’ नहीं था। मम्मी साक्षर है पापा नहीं। उन्होंने अपनी ओर से हमारी अच्छी शिक्षा और पालन-पोषण के भरपूर प्रयास किए है। जब मुझमें समझदारी आई तो महसूस हुआ कि अंग्रेजी स्कूल में पढ़ना ज्यादा अच्छा है। वहां किताबें ज्यादा अच्छी पढ़ाई जाती है।
यह समय आते-आते देर हो चुकी थी। अब तो हिन्दी किताबें ही पढ़नी थी। पापा कोयला खदान में मजदूर है। इसलिए महंगी अंग्रेजी किताबों वाले स्कूल में पढ़ाना उनके लिए आर्थिक रूप से भी संभव न था। हम दो भाई एक बहन है। सिर्फ दीदी के लिए नई किताबें खरीदी जाती थी। दीदी के बाद भईया और फिर मैं भी उन्हीं किताबों से पढ़ते थे।
पापा के पास पुश्तैनी धन भी नहीं है। दादाजी का पेशा किसानी ही है। पापा का कभी ‘इन’ किताबों से वास्ता नहीं हुआ। किताबें पढ़ने के लिए स्कूल में उनका नाम तो दर्ज हुआ था पर दूसरे के खेत में बंधुआ मजदूरी करनी पडती थी तो.... कभी उनका किताबों से क, ख, ग... भी नहीं पढ़ा। पर अपने बच्चों को अपने सामर्थ्य कहीं ज्यादा पढ़ा रहे है। आय का एक मात्र साधन कोयला खदान की नौकरी, उन्हें अपने बच्चों को महंगी अंग्रेजी किताबों वाले स्कूल में पढ़ाने में असमर्थ कर देती थी। तो हमने हमारी हिन्दी भाषा की किताबें ही पढ़ी।
हाईस्कूल तक घर में कभी कोई अखबार, पत्रिका या कॉमिक्स नहीं आई। तो नॉवेल और बाकी साहित्य तो दूर की कौड़ी थी। उस समय तक तो सिर्फ स्कूल की उन्हीं हिन्दी की किताबों से वास्ता रहा जो मध्य प्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम की थी। और ये किताबें मेरे जन्म के समय से हाईस्कूल में पहुंचने तक नहीं बदली थी। निहायती नीरस और गुजरे समय की ये किताबें कभी मेरी सच्ची दोस्त नहीं बन सकी।
मैं कॉलेज में जनसंचार की पढ़ाई करने देवी अहिल्या विश्वविधालय इंदौर गया। बहुत सुन रखा था किताबों के ‘मंदिर’ लाइब्रेरी के बारे में यहां जीवन में पहली बार लाइब्रेरी का मुंह देखा। किताबों की इस दुनिया में किताबें और मैं एक-दूजे को अजनबी महसूस कर रहे थे क्योंकि हम दोनों का कभी ‘ठीक से’ परिचय नहीं हुआ था।
लाइब्रेरी की किताबों से परिचय करना शुरू किया। पर मैं अंग्रेजी किताबों से कोशिशों के बाद भी दोस्ती नहीं कर पाया। वजह थी हमारे बीच भाषा की खाई। बचपन से अब तक से बिल्कुल उलट इंसानों से दोस्ती के इतर किताबों को सच्ची दोस्त बनाने की भरसक कोशिशें की। पर बचपन की आदतें जाते-जाते ही जाती है। अंग्रेजी किताबों से ‘दोस्ती’ न हो पाते देख हिन्दी किताबों को अपने करीब लाया। किताबों को अपना ठीक-ठाक दोस्त बना लिया।
पीजी करने दिल्ली आया। तब आइआईएमसी की लाइब्रेरी में मेरी नई-नई दोस्त ‘हिन्दी किताबों’ की गिनती बहुत कम पाई। जो थी वो लाइब्रेरी में एक तरफ चुपचाप दुबके हुए थी। मैंने इन किताबों से अपनी दोस्ती को आगे बढ़ाया। पर इस दौरान पता चला कि हिन्दी और अंग्रेजी किताबों की दोस्ती में बड़ा अंतर है। हिन्दी किताबों से दोस्ती किसी पांचवी पास व्यक्ति से दोस्ती की तरह है। जबकि अंग्रेजी किताबों से दोस्ती किसी पीएचडी किए व्यक्ति से दोस्ती के बराबर है।
आज जब मैं आइआईएमसी के पुस्तक मेले में खड़ा था अपने आप को अजनबीयों के बीच पा रहा था। मेरी दोस्त हिन्दी किताबें यहा भी एक तरफ चुपचाप दुबके हुए थी। वहीं अंग्रेजी की किताबें सर उठाकर दंभ भर रही थी।
मैंने प्रदर्शनी में चारों तरफ नजर घुमाई और प्रदर्शनी के हॉल से बाहर आ गया। मेरे मन में ये विचार कौंध रहा था कि मेरी हिन्दी विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। पर निराशा की बात है कि लाइब्रेरी में मेरा दोस्त हिन्दी किताबों की संख्या दयनीय स्तर तक कम है। और वे वहां चुपचाप दुबके हुए ही रहती है।
हालांकि मैं हिन्दी किताबों को अपना सच्चा दोस्त नहीं बना पाया हूं। पर हमारी दोस्ती समय के साथ गहरी और सच्ची होती रही है। अब साथ ही साथ मैं अंग्रेजी किताबों से भी संवाद करना चाहता हूं ताकि वो मुझे बिल्कुल अजनबी ना लगे। आशा करता हूं मेरी सच्ची दोस्त हिन्दी किबातों की संख्या तेजी से बढ़े। मेरी हमसाथी के साथ मेरी दोस्ती सच्ची, निरंतर और सक्रीय रहे।
Thursday, January 20, 2011
Wednesday, January 19, 2011
Monday, January 17, 2011
Tuesday, January 11, 2011
कार्टून- बड़े आदमी का खत
पहले सेमेस्टर के बाद कॉलेज की छुट्टियां हुई। सेमेस्टर एग्जाम से पहले मेरे कॉलेज आइआईएमसी ने हमारी क्लास में उपस्थिति के प्रतिशत की जानकारी का लेटर हमारे घर भेजा। मैं जब घर गया तो घरवालों ने कहा- 'ये क्या है रे? कॉलेज क्यों नहीं जाता है, तेरी क्लास में उपस्थिति कम है।' पापा ने कहा- 'यही नाम कर रहा है क्या दिल्ली जाकर! हमें तुम्हारे कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. आनंद प्रधान का लेटर आया था।'
मैंने कहा- कहां है लेटर? मैंने उत्सुकता और खुशी के साथ लेटर पढ़ा और घरवालों से कहा- आपको तो लेटर पाकर खुश होना चाहिए! एक तो अरसे बाद कोई लेटर आया है। इतने बड़े आदमी ने आपको लेटर लिखकर आपके सकुशल होने की खैर-खबर ली। इतने दिनों बाद लेटर पढ़कर तो आपको खुश होना चाहिए। मेरे कारण एक तो आपको लेटर आया और वो भी इतने बड़े आदमी का। भारतीय डाक वालों का भी भला हुआ, वरना आजकल डाक से कितने कम लेटर भेजता है कोई।
Monday, January 10, 2011
यारों... जी भर के जी ले पल!
हम दोस्ती-यारी की बड़ी दुहाई देते है, स्कूल से लेकर कॉलेज के दिनों तक। पर हम इस दोस्ती को कितना दुरुस्त रख पाते है? सोचने वाली बात है। स्कूल में सालों साथ पढ़ने के बाद हम 7-8 दोस्तों का ग्रुप इंदौर में कॉलेज की पढ़ाई करने गए। यहां एक ही शहर में रहते हुए भी हम कभी नहीं मिलते थे। जबकि स्कूल के समय बड़ी-बड़ी बातें करते थे कि हम मिला करेंगे, ऐसा करेंगे...वैसा करेंगे...। पर आखिरकार एक शहर में होकर भी हम पुराने ‘दोस्त’ कभी नहीं मिलते। इंदौर आने के एक-दो महिनों में ही फोन पर बात करना भी लगभग बंद हो गया। स्कूल के समय दोस्ती रहते हुए किए गए सारे वादें धरे रह गए। यहां तक कि छुट्टियों में घर पहुंचने पर भी एक-दूसरे की खैर-खबर नहीं लेते है। कभी कहीं सामना हो जाए फिर तो मिल ही लेते है।
फिर इंदौर में ग्रेजुएशन के दौरान तीन साल जिन दोस्तों के साथ बिताए अब वे दोस्त भी दिल्ली में है, और मैं भी हूं। एक ही शहर में रहते हुए हम सातों दोस्त आज सात महिनों से नहीं मिले। अब पीजी कर रहा हूं। सोच लिया हे दोस्ती मे कोई कोरे वादें और बड़ी-बड़ी बातें नहीं करूंगा न सुनुंगा। जो वर्तमान समय है उसी में दोस्ती यथासंभव ठीक से निभाउंगा। आगे क्या क्या करूंगा, क्या होगा इसके बारे में इसके कोई कोरे वादें दोस्तों से स्वीकार नहीं करूंगा। यही अच्छा रहेगा।
भई, कोरे वादें, मुगालते और बड़ी-बड़ी बातें करने से ही दोस्ती बड़ी नहीं हो जाती है। मेरे हिसाब से दोस्ती की साथर्कता और सफलता वर्तमान समय में दोस्ती को यथासंभव ठीक से निभाने में ही है। बड़ी-बड़ी बातें, कोरे वादें और दिखावे से दोस्ती का वर्तमान तो कमजोर रहता ही है और भविष्य में भी दोस्ती बने रहने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। इसलिए यारों... जी भर के जी ले पल!
21 दिसंबर और वही मोबाइल नंबर
मुझे जब से याद है मैं एक ही लड़की से प्यार करता था। पहला और सच्चा प्यार, ये प्यार बड़ा 'खतरनाक' तरह का होता है। शायद इसका असर जि़ंदगी भर के लिए रह जाता है। मुझे स्कूल के समय से ही वो पसंद थी और वो भी मुझे पसंद करती थी। स्कूल में पढ़ने के दौरान ही हम दोनों ने अलग-अलग स्कूल में एडमिशन ने लिया और हम अलग हो गए। 5-6 साल तक हमारे बीच कोई संपर्क नहीं रहा पर मेरे अंदर का प्यार वैसे ही रहा।
जब हम 12वीं में थे एक ही ट्यूशन में पढ़ने पहुंचे। मैंने लंबे समय बाद उसे देखा। 8-9 महिनें साथ ट्यूशन पढ़ने के बाद भी हमने कभी बात नहीं की। हालांकि मैंने उसे उसके बर्थडे पर गिफ्ट दिया और हाथ मिलाया। पहली और आखिरी बार उसे छुआ। 12वीं पास होने के बाद वो इंजीनियरिंग करने भोपाल चली गई और मैं मास कम्यूनिकेशन करने इंदौर चला गया।
एक दिन उसका फोन मेरे मोबाइल पर आया, हमारी काफी बातें हुई। बातों का सिलसिला बहुत बढ़ गया, अब हम घंटों फोन पर बतियाने थे। उसने बताया कि वो भी मुझे पसंद करती थी पर कभी कह नहीं पाई। मैंने भी अपने दिल की सारी बातें उसे बताई। मैंने उसे प्यार का प्रस्ताव दिया उसने कभी ना नहीं कहा पर कभी हां भी नहीं कहा। उसका कोई स्पष्ट जवाब न मिलते देख मैंने अब इसे दोस्ती तक ही सीमित रहने दिया।
इसके बाद कई बार फोन पर बातें हुई। उसके बर्थडे पर मिलने भोपाल गया जहां हमने साथ लंच किया और मैंने गिफ्ट दिया। फिर उसके बारे में मुझे मेरे दोस्तों से कुछ बातें पता चली। एक दिन मैंने उसे फोन पर कुछ बातें कह दिया और तब से हम दोनों की बीच बात बंद हो गई। उसका नंबर भी बदल गया। मैंने उसे ऑर्कुट-फेसबुक पर भी ढूंढ़ा पर वो ना मिली। हालांकि मैं उसका मोबाइल नंबर पता कर सकता था पर मैंने जानबूझ कर ही एैसा करने की कोशिश नहीं की। क्योंकि मेरा तो आज भी वही मोबाइल नंबर चालू है जिस पर हम घंटों बातें करते थे..।
बात हुए 3 साल हो चुके है पर ये 3 साल एक दशक की तरह लगते है। मैं कहीं न कहीं उसे आज भी 'प्यार' करता हूं। 21 दिसंबर को उसका बर्थडे हमेशा याद रहता है..।
जब हम 12वीं में थे एक ही ट्यूशन में पढ़ने पहुंचे। मैंने लंबे समय बाद उसे देखा। 8-9 महिनें साथ ट्यूशन पढ़ने के बाद भी हमने कभी बात नहीं की। हालांकि मैंने उसे उसके बर्थडे पर गिफ्ट दिया और हाथ मिलाया। पहली और आखिरी बार उसे छुआ। 12वीं पास होने के बाद वो इंजीनियरिंग करने भोपाल चली गई और मैं मास कम्यूनिकेशन करने इंदौर चला गया।एक दिन उसका फोन मेरे मोबाइल पर आया, हमारी काफी बातें हुई। बातों का सिलसिला बहुत बढ़ गया, अब हम घंटों फोन पर बतियाने थे। उसने बताया कि वो भी मुझे पसंद करती थी पर कभी कह नहीं पाई। मैंने भी अपने दिल की सारी बातें उसे बताई। मैंने उसे प्यार का प्रस्ताव दिया उसने कभी ना नहीं कहा पर कभी हां भी नहीं कहा। उसका कोई स्पष्ट जवाब न मिलते देख मैंने अब इसे दोस्ती तक ही सीमित रहने दिया।
इसके बाद कई बार फोन पर बातें हुई। उसके बर्थडे पर मिलने भोपाल गया जहां हमने साथ लंच किया और मैंने गिफ्ट दिया। फिर उसके बारे में मुझे मेरे दोस्तों से कुछ बातें पता चली। एक दिन मैंने उसे फोन पर कुछ बातें कह दिया और तब से हम दोनों की बीच बात बंद हो गई। उसका नंबर भी बदल गया। मैंने उसे ऑर्कुट-फेसबुक पर भी ढूंढ़ा पर वो ना मिली। हालांकि मैं उसका मोबाइल नंबर पता कर सकता था पर मैंने जानबूझ कर ही एैसा करने की कोशिश नहीं की। क्योंकि मेरा तो आज भी वही मोबाइल नंबर चालू है जिस पर हम घंटों बातें करते थे..।
बात हुए 3 साल हो चुके है पर ये 3 साल एक दशक की तरह लगते है। मैं कहीं न कहीं उसे आज भी 'प्यार' करता हूं। 21 दिसंबर को उसका बर्थडे हमेशा याद रहता है..।
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