Journalist by nature. Occasional FBवाला writer, rarely photographer, 6 day designer & one day Bachelor.
Saturday, January 28, 2012
Monday, January 23, 2012
Wednesday, January 18, 2012
Sunday, November 6, 2011
IIMC HJ 10-11 LogOut भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली के हिंदी पत्रकारिता का 'लॉगआउट' के वीडियो
भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली के हिंदी पत्रकारिता का 'लॉगआउट' के ये सारे वीडियो मैंने अपने मोबाइल के कैमरे से कैद किये थे। आशा है ये हमलोग की यादों को ताजा बनाए रखेंगे।
फैकल्टीज की बात
रोहित जोशी का गीत 1
रोहित जोशी का गीत 2
हिमांशु सिंह की कविता- 'अब याद तुम्हारी आएगी'
प्रणव का गीत- 'यारों दोस्ती भी..'
राहुल दुबे का गीत- 'हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है..'
जावेद की दुकान पर प्रधान सर के साथ एचजे की टी पार्टी 1
जावेद की दुकान पर प्रधान सर के साथ एचजे की टी पार्टी 2
जावेद की दुकान पर प्रधान सर के साथ एचजे की टी पार्टी 3
शहर में दीपावली न मना सकूंगा
शहर में दीपावली न मना सकूंगा शहर को जाते, मां के पैर छूते हुए उन्हें कहता कि अच्छे से रहना और अपना ख्याल रखना। जबकि बतौर जवान बेटा इन बातों की जिम्मेदारी मेरी ही है। अक्सर करियर की राहें हमें अपने घर-परिवार से दूर ले जाती है। इन त्यौहार के मौसम में शहर में रहते हुए दूर अपने घर-परिवार में मनाए त्यौहारों की याद मन में बहुत कौंधती है।
दीपावली हमारे लिए महापर्व है। आज जब मैं शहर में हूं तो यहां भी दीपावली के लिए घर की सफाई हो रही है। त्यौहार का माहौल बनना शुरू हो जाता है। महानगरों से इतर छोटे कस्बों में रहने वाले मध्यमवर्गीय परिवार दीपावली के लिए अपने कच्चे-पक्के से घर की सफाई कर उसकी खूबसूरती बढ़ाने में जुट जाते हैं। ऐसे परिवारों में घर की सफाई, पुताई, सजावट से लेकर पकवान बनाने तक के सारे काम परिवार के सदस्य मिलकर करते हैं। त्यौहार की तैयारियों की पड़ोसियों से चर्चा होती है। उनमें तैयारियों को पूरा करने को लेकर एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी होती है। ये सब होने के बाद त्यौहार
पूरे मोहल्ले में मिलकर मनाया जाता है। शहर में बात ऐसी नहीं नहीं होती है। यहां आप पड़ोसी को ठीक से जानते भी नहीं है। अपने घर में ही त्यौहार मना लेते है।
मैं शहर के एक मकान में किराए से रह रहा हूं। महीनों हुए यहां रहते लेकिन मैं नीचे की मंजिल पर रहने वाले मकान मालिक का नाम तक नहीं जानता हूं। उन्होंने भी कभी मुझसे मेरा नाम तक नहीं पूछा। आज मैंने मकान मालिक के खेलते बच्चे से उसका नाम पूछ ही लिया। उसके बाद महसूस हुआ कि मैं यहां शहर में दीपावली न मना सकूंगा। बस, जल्द ही घर जाना हो जाए और मम्मी-पापा का दीपावली की तैयारियों में हाथ बंटाऊं। ऐसे शहर में मानवीय रिश्तों की शून्यता के बीच दीपावली नहीं मना सकता। अपने कस्बे लौटकर घर पर मिट्टी के दीए में घी से दीप जलाकर दीपावली मनाउंगा। यहां शहर में मोमबत्ती जलाकर दीपावली क्या मनाना।
हलवा-केक याद आता है
(*मेरे जन्मदिवस पर विशेष!)
मेरा जन्मदिन कई दफा दीपावली के दौरान आता है। हमारे मध्यवर्गीय परिवार में सारे सदस्य मिलकर घर की सफाई-पुताई और बाकी तैयारियां करते हैं। दीपावली से दो-तीन दिन पहले हम सब घर की पुताई में जुटे हुए थे। उस दिन मेरा जन्मदिन था और किसी को याद नहीं था। पिछले दफा भी दीपावली की तैयारियों में सभी मेरा जन्मदिन भूल गए थे। रात हो गई और किसी को मेरा जन्मदिन याद नहीं आया। मैं भी पुताई के काम में लगा रहा।
रात करीब साढ़े दस बजे क्या देखता हूं कि मेरी बड़ी बहन ने मुझे दूसरे कमरे में पुकारा। मैं पुताई का काम रोक उस कमरे में गया,तो देखता हूं कि आटे का गरम-गरम हलवे को एक प्लेट में रखकर केक का आकार दे दिया गया है। इसके बीच में एक बड़ी और मोटी से मोमबत्ती जल रही थी।
दीदी और मम्मी ने कहा कि,अरे तेरा जन्मदिन ही ऐसे समय में आता है कि हम दीपावली की तैयारियों में जन्मदिन भूल ही जाते हैं। अभी याद आया तो हमने तेरे लिए ऐसा केक बनाया। मेरा मन भर आया और आंखें नम हो गई। जुबां से थोड़े देर तक शब्द ही नहीं निकले। खुशी के आंशुओं से डबाडब आखें मैंने कहा कि पिछली बार भी आप लोग मेरा जन्मदिन भूल गए थे।
मैंने बड़ी खुशी से ‘हलवा-केक’ कांटा। उस दिन को आठ साल हो चुके हैं। मेरा आठ जन्मदिन भई आए लेकिन कभी केक कांटना नहीं हुआ। इस 14 अक्तूबर मेरा जन्म आया/आ रहा है और मुझे मम्मी और दीदी का बनाया केक बहुत याद आया/आएगा। ‘हलवा-केक’ काटे 9 साल पूरे हो जाऐंगे/गए। आज भी जब वो जन्मदिन याद आता है तो भावुक हो जाता हूं। जाने अब कब दीपावली में घर की पुताई करते हुए ‘हलवा-केक’ काटना नसीब होगा।
Wednesday, August 31, 2011
चूहा कपड़े न कुतरता..
▐┌ आज अपनी मकानमालकिन के साथ मंदिर गया। यह उनके घर से नजदीक ही है लेकिन वे लोग यहां एक साल से नहीं आए थे। इतने दिनों बाद मदिर आने का कारण वह चूहे के कपड़े कुतर देना बताया।
हमारे मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे-चर्च जाने और त्यौहार मनाने के पीछे जितनी छोटे कारण होते है। उससे कहीं छोटे और टुच्चे कारण ऐसा न करने के होते।
अगर वह चूहा कपड़े न कुतरता तो आज गणेशजी को मंदिर में इस भक्त के दर्शन न होते!
हमें अपनी ईद ..
ई
▐┌कुछ दिनों पहले घर था। भांजे-भांजी के लिए ईद वाली सेवईयां लाया। उन्होंने बड़े चाव से खायी। उन नवकल्पितों को नहीं पता कि धर्म क्या और उसके अलग-अलग खानपान क्या।
▐┌कुछ दिनों पहले घर था। भांजे-भांजी के लिए ईद वाली सेवईयां लाया। उन्होंने बड़े चाव से खायी। उन नवकल्पितों को नहीं पता कि धर्म क्या और उसके अलग-अलग खानपान क्या।
मुझे भी बचपन में यह नहीं पता था और मैं भी चाव से सेवईयां खाता था। बड़े होने के साथ हमें दुनियादार बनाया दिया गया।अब हम खान-पान में भी धर्म आदि का गुणा-भाग करने लगते है। कितना अच्छा होता है जब हम एक-दूसरे के धर्म, जाति का सांस्कृतिक आदान-प्रदान करते हैं। मैं दोनों ईद मनाता हूं और इन्हें मनाने वाले बंधुओं के साथ साझा भी करता हूं।
हमें अपनी ईद मुबारक
Wednesday, July 6, 2011
दुपहिया, तीन पीढ़ी और चौपहिया
प हिया निरंतर घूमता है उसे थामना अपने हाथ में कहां? अपन तो समय के इस गोल पहिये को अपनी गोल आखों से देख ही सकते है। समय था जब मेरे पांचवी क्लास में पढ़ने के दौरान मेरे मुहल्ले की गलियों में सिर्फ मेरी ही सायकल की घंटी ट्रिन-ट्रिनाती थी।
स्कूल के मैदान में अध्यापकों की कुछेक साइकल की बगल में मेरी सायकल ठाठ मारे खड़ी होती थी। पूरे स्कूल में बमुश्किल दर्जनभर सायकल। उस समय सायकल के साथ मेरा वो समय किसी लग्जरी से कमतर न था। एक और सायकल थी, जो गली में मोरनी की तरह लहजे में चलती आती थी।
वो थी मेरे पापा की हरे रंग की सायकल। जिसे मैं अपनी स्मृति की शुरुआती परत से जानता हूं। जैसे मैं अपनी पहली ‘पसंद’ को याद कर पाता हूं।
समय का ये पहिया सरपट घूमता गया। दसवीं कक्षा पहुंचते-पहुंचते मेरी दूसरी नई आ गई। बसमय अतह एडवांस। स्पीडोमीटर, टर्न-इंडीगेटर लाइट, हॉर्न और रियर बास्केट। ये भी उसी कंपनी की थी और नाम था ‘हीरो सायरन’। इसे लेकर स्कूल के कम लेकिन ट्यूशन की खूब ‘दौड़’ लगाई है। स्कूल छूटा पर सायकल से लगाव नहीं।
ग्रेजुएशन में नई स्पोर्ट सायकल खरीदी। पर अब अपन इंदौर शहर में पढ़ने आ चुके थे। शहर, जहां सायकल ‘स्टेट्स सिंबल’ नहीं होता है। कुछेक दिन चलाई फिर बेच दी। सायकल की जगह अब बाइक ने ले ली। इधर पापा की सायकल जिसे मैं अपने बचपन से जानता हूं, उसकी पूछ कम होने लगी।
पापा की यह सायकल पहले बड़े नाजों के साथ रखी जाती थी। वयोवृद्ध हो चुकी यह सायकल करीबन मेरी ही उम्र की है। जबकि मैंने अपनी जिंदगी का तेईसवां वसंत भी पूरा नहीं किया है। पापा ने अपनी इसी सायकल के साथ अपनी नौकरी का सारा दौर काटा है। समय का पहिया पापा की नौकरी के आखिरी महीनों की ओर घूमने को है। इस सायकल की मदद के बिना दिन-रात की सिफ्ट्स में, सम-विषम मौसम के बीच पापा की नौकरी उतनी आसान न होती। आज इस सायकल और नौकरी के भरोसे, पढ़-लिखकर इस मुकां तक पहुंचने के लिए मैं इस सायकल के प्रति कृतज्ञ हूं। अब पापा ने सायकल चलाने से कन्नी काटना शुरु कर दिया है। अब पहिया, कलाई घुमाने से जो घूमने लगा।
अब सायकल की ट्रिन-ट्रिन से नहीं बल्कि बाइक की तेज पीं-पीं से पापा के नौकरी से लौट आने की आहट होती है। जिस तरह जैसे डाकिया की सायकल की ट्रिन-ट्रिन को ई-मेल खा गया, बाइक ने भी यही किया।
हाल के दिनों में, पांच साल से भी छोटे मेरे भांजी-भांजा को भी सायकल बतौर उपहार मिली है। मैंने अपनी पहली नियमित पूर्णकालिक नौकरी की पहली तनख्वाह से उन्हें यह जन्मदिन का उपहार दिया। लेकिन मुझे यह आशंका हे कि सायकल से उनकी ये दोस्ती लंबी न चलेगी।
क्योंकि अब अनके पापा ने दुपहिया के बाद चौपहिया खरीद ली है। ऐसे में सायकल को कार कहीं पीछे छोड़ देगी। इससे मेरी ये पुरानी दुपहिया दोस्त ‘सायकल’ समय के पहिए का निशान बनकर रह जाएगी।
समय का पहिया बलवान होता है। दुपहिया को तीन पीढ़ियों में चौपहिया तक घुमा चुका है। लेकिन मैं जानता हूं ये चौपहिया मेरी सायकल से कहीं ज्यादा... ठाठ और आराम देगी। फिर भी जोश और उत्साह में सायकल के पैडल को भिंगरी बनाकर, पहियों को मुहल्लों की तंग गलियों, कूचों में सरपट दौड़ना, हमेशा मेरे जीवन के सुहाने यादगार लम्हें रहेंगे।
बहरहाल अपनी नौकरी के लिए किराए पर ली बाइक का इस्तेमाल करता हूं। लेकिन पापा के नौकरी पर जाने और लौटने पर सायकल पर मेरी पारी का वो आनंद, मेरे लिए पापा की उस सायकल की तरह आज भी जवां है। समय का पहिया घूमता रहेगा, और शायद सायकल के उस आनंद का अहसास मैं बतौर पिता अपने बच्चों को न दे पाउं!
स्कूल के मैदान में अध्यापकों की कुछेक साइकल की बगल में मेरी सायकल ठाठ मारे खड़ी होती थी। पूरे स्कूल में बमुश्किल दर्जनभर सायकल। उस समय सायकल के साथ मेरा वो समय किसी लग्जरी से कमतर न था। एक और सायकल थी, जो गली में मोरनी की तरह लहजे में चलती आती थी।
वो थी मेरे पापा की हरे रंग की सायकल। जिसे मैं अपनी स्मृति की शुरुआती परत से जानता हूं। जैसे मैं अपनी पहली ‘पसंद’ को याद कर पाता हूं।
समय का ये पहिया सरपट घूमता गया। दसवीं कक्षा पहुंचते-पहुंचते मेरी दूसरी नई आ गई। बसमय अतह एडवांस। स्पीडोमीटर, टर्न-इंडीगेटर लाइट, हॉर्न और रियर बास्केट। ये भी उसी कंपनी की थी और नाम था ‘हीरो सायरन’। इसे लेकर स्कूल के कम लेकिन ट्यूशन की खूब ‘दौड़’ लगाई है। स्कूल छूटा पर सायकल से लगाव नहीं।
ग्रेजुएशन में नई स्पोर्ट सायकल खरीदी। पर अब अपन इंदौर शहर में पढ़ने आ चुके थे। शहर, जहां सायकल ‘स्टेट्स सिंबल’ नहीं होता है। कुछेक दिन चलाई फिर बेच दी। सायकल की जगह अब बाइक ने ले ली। इधर पापा की सायकल जिसे मैं अपने बचपन से जानता हूं, उसकी पूछ कम होने लगी।
पापा की यह सायकल पहले बड़े नाजों के साथ रखी जाती थी। वयोवृद्ध हो चुकी यह सायकल करीबन मेरी ही उम्र की है। जबकि मैंने अपनी जिंदगी का तेईसवां वसंत भी पूरा नहीं किया है। पापा ने अपनी इसी सायकल के साथ अपनी नौकरी का सारा दौर काटा है। समय का पहिया पापा की नौकरी के आखिरी महीनों की ओर घूमने को है। इस सायकल की मदद के बिना दिन-रात की सिफ्ट्स में, सम-विषम मौसम के बीच पापा की नौकरी उतनी आसान न होती। आज इस सायकल और नौकरी के भरोसे, पढ़-लिखकर इस मुकां तक पहुंचने के लिए मैं इस सायकल के प्रति कृतज्ञ हूं। अब पापा ने सायकल चलाने से कन्नी काटना शुरु कर दिया है। अब पहिया, कलाई घुमाने से जो घूमने लगा।
अब सायकल की ट्रिन-ट्रिन से नहीं बल्कि बाइक की तेज पीं-पीं से पापा के नौकरी से लौट आने की आहट होती है। जिस तरह जैसे डाकिया की सायकल की ट्रिन-ट्रिन को ई-मेल खा गया, बाइक ने भी यही किया।
हाल के दिनों में, पांच साल से भी छोटे मेरे भांजी-भांजा को भी सायकल बतौर उपहार मिली है। मैंने अपनी पहली नियमित पूर्णकालिक नौकरी की पहली तनख्वाह से उन्हें यह जन्मदिन का उपहार दिया। लेकिन मुझे यह आशंका हे कि सायकल से उनकी ये दोस्ती लंबी न चलेगी।
क्योंकि अब अनके पापा ने दुपहिया के बाद चौपहिया खरीद ली है। ऐसे में सायकल को कार कहीं पीछे छोड़ देगी। इससे मेरी ये पुरानी दुपहिया दोस्त ‘सायकल’ समय के पहिए का निशान बनकर रह जाएगी।
समय का पहिया बलवान होता है। दुपहिया को तीन पीढ़ियों में चौपहिया तक घुमा चुका है। लेकिन मैं जानता हूं ये चौपहिया मेरी सायकल से कहीं ज्यादा... ठाठ और आराम देगी। फिर भी जोश और उत्साह में सायकल के पैडल को भिंगरी बनाकर, पहियों को मुहल्लों की तंग गलियों, कूचों में सरपट दौड़ना, हमेशा मेरे जीवन के सुहाने यादगार लम्हें रहेंगे।
बहरहाल अपनी नौकरी के लिए किराए पर ली बाइक का इस्तेमाल करता हूं। लेकिन पापा के नौकरी पर जाने और लौटने पर सायकल पर मेरी पारी का वो आनंद, मेरे लिए पापा की उस सायकल की तरह आज भी जवां है। समय का पहिया घूमता रहेगा, और शायद सायकल के उस आनंद का अहसास मैं बतौर पिता अपने बच्चों को न दे पाउं!
Saturday, July 2, 2011
बहरहाल, आल इज वेल!
आज 'राजस्थान पत्रिका' जयपुर संस्करण के 'जस्ट जयपुर' में मेरा कार्टून कॉलम 'जस्टtoon' प्रकाशित हुआ है।
बहुत खुश हूं। आज अखबारी व्यंग्यचित्रकार भी हो गए।
बहरहाल इसके लिए समय के लिहाज से आशुतोष दिवेदी, दिलिप मंडल, इस्माइल लहरी, जयदीप कर्णिक, पुष्पेश पुष्प, महेंद्र प्रताप सिंह, अरविंद कुमार सेन, रवि, जितेंद्र राज चावला, संजीव माथुर और माणक लाल शर्मा आदि के मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन के लिए तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूं। आप लोगों के साथ इन सीढ़ियों का अंदाजा लगा।
जी करता है, कमसकम एक कोर खिलाकर आपका लोगों का मुंह मीठा कर दूं। लेकिन, पत्रकारी पेशे की यह नौकरी उपरोक्त लोगों की तरह साथ नहीं देती। मूही, फिलहाल साढ़े छह हजार के आस-पास तक की ही है।
आर्थिक सौजन्यों और आभारों खर्चापानी निपटा रहे है। एक टाइम का खाकर अगले के लिए आर्थिक इंतजाम करते है। वैसे इस 7 को 'गुजारा भत्ता' मिलेगा, तकरीबन 62-64 सौ रुपए। इसमें 2380 रुपए को कर्जा जो 7 तारीख तक और बढ़ जाएगा, के सहित सात से आठ हजार का अनिवार्य खर्च वहन करना है।
गोयाकि यह पत्रकारिता है और अपन इसके इसी धरातल पर है।
बीती रात एक पांच सितारा हॉटल 'मेरियेट' की इनॉग्रेशन डिनर पार्टी में रिर्पोटिंग करने गया था। लौटकर '27 रुपए में फुल धमाल' कर डिनर के रूप में अन्नपूर्णा माता के दर्शन किए। एक प्याउ से पीने का पानी, मांगी हुई एक बॉटल में भरकर रूम पर ले गया। एक आईआईएमसीयन दोस्त रात रूम पर मिलन आ गया था तो किराए की बाइक में पेट्रोल और डिनर खरीद पाया।
आज डिनर के लिए एक मित्र के साथ जुगाड़ की जुगत की थी, पर बात नहीं बनी। बहरहाल अभी लंच करने के लिए 10 रुपए के चार 'कागज' है और कुछ गोलाकार धातुएं भी है। लेकिन डिनर के लिए जुगाड़ तो करना ही है। ब्रेकफास्ट तो पिछले ढ़ेड-दो सालों में लगभग भूला-बिसरा सा शब्द हो गया है।
इन्हीं खुशियों और राहों के बीच जिंदगी (रेडियो वाले इरफान सर इसे ज़िन्दगी पढ़े) बढ़िया चल रही है।
इन खुशियों को माता-पिता, भगवान और 'प्रेमिका' को भी समर्पित करता हूं। 'प्रेमिका' जिसे उसकी शादी होने के बाद से देखे कुछ बरस हो गए है। बस माता रानी की कृपा है। आल इज वेल!
बहुत खुश हूं। आज अखबारी व्यंग्यचित्रकार भी हो गए।
बहरहाल इसके लिए समय के लिहाज से आशुतोष दिवेदी, दिलिप मंडल, इस्माइल लहरी, जयदीप कर्णिक, पुष्पेश पुष्प, महेंद्र प्रताप सिंह, अरविंद कुमार सेन, रवि, जितेंद्र राज चावला, संजीव माथुर और माणक लाल शर्मा आदि के मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन के लिए तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूं। आप लोगों के साथ इन सीढ़ियों का अंदाजा लगा।
जी करता है, कमसकम एक कोर खिलाकर आपका लोगों का मुंह मीठा कर दूं। लेकिन, पत्रकारी पेशे की यह नौकरी उपरोक्त लोगों की तरह साथ नहीं देती। मूही, फिलहाल साढ़े छह हजार के आस-पास तक की ही है।
आर्थिक सौजन्यों और आभारों खर्चापानी निपटा रहे है। एक टाइम का खाकर अगले के लिए आर्थिक इंतजाम करते है। वैसे इस 7 को 'गुजारा भत्ता' मिलेगा, तकरीबन 62-64 सौ रुपए। इसमें 2380 रुपए को कर्जा जो 7 तारीख तक और बढ़ जाएगा, के सहित सात से आठ हजार का अनिवार्य खर्च वहन करना है।
गोयाकि यह पत्रकारिता है और अपन इसके इसी धरातल पर है।
बीती रात एक पांच सितारा हॉटल 'मेरियेट' की इनॉग्रेशन डिनर पार्टी में रिर्पोटिंग करने गया था। लौटकर '27 रुपए में फुल धमाल' कर डिनर के रूप में अन्नपूर्णा माता के दर्शन किए। एक प्याउ से पीने का पानी, मांगी हुई एक बॉटल में भरकर रूम पर ले गया। एक आईआईएमसीयन दोस्त रात रूम पर मिलन आ गया था तो किराए की बाइक में पेट्रोल और डिनर खरीद पाया।
आज डिनर के लिए एक मित्र के साथ जुगाड़ की जुगत की थी, पर बात नहीं बनी। बहरहाल अभी लंच करने के लिए 10 रुपए के चार 'कागज' है और कुछ गोलाकार धातुएं भी है। लेकिन डिनर के लिए जुगाड़ तो करना ही है। ब्रेकफास्ट तो पिछले ढ़ेड-दो सालों में लगभग भूला-बिसरा सा शब्द हो गया है।
इन्हीं खुशियों और राहों के बीच जिंदगी (रेडियो वाले इरफान सर इसे ज़िन्दगी पढ़े) बढ़िया चल रही है।
इन खुशियों को माता-पिता, भगवान और 'प्रेमिका' को भी समर्पित करता हूं। 'प्रेमिका' जिसे उसकी शादी होने के बाद से देखे कुछ बरस हो गए है। बस माता रानी की कृपा है। आल इज वेल!
Friday, July 1, 2011
बला.. अबला..
ए क ही रास्ता था दोनों के स्कूल का। दोनों के स्कूल के रास्ते एक-दूजे के विपरीत थे पर किस्मत में शायद दोनों के रास्तों का जुड़ाव लिखा था। दोनों किशोरावस्था में अपनी स्कूलिंग करते प्यार नामक चीज की भी स्कूलिंग लेने की स्वभाविक स्थिति में थे। तो कक्षा दसवी के इस छात्र को आठवी कक्षा की इस लड़की के दीदार उस एक ही रास्ते पर हुए। दोनों पहली मुलाकात में एक-दूसरे को ध्यान से देखा किये। पतझड़ के उस मौसम में इन दोनों पौधों में प्यार के भौंर आने शुरू हुए। लड़की के लिए ये ताजातरीन अनुभव था और लड़के के लिए प्रेमप्रसंग का एक असल अनुभव। दोनों ने पहली मुलाकाम में एक-दूसरे को फौरी तौर पर पसंद किया।
स्कूल का शैक्षणिक सत्र समाप्त हुआ और अब पतझड़ दोनों के शुरूआती जुड़ाव में शुरू हुआ। लड़का ग्यारहवी कक्षा में लड़की के भाई का ही सहपाठी हो गया। शुरूआत में तो लड़का ये नहीं जानता था कि उसके प्रेमप्रसंग की नायिका इस लड़के की बहन है। रास्ता एक ही था पर लड़की-लड़के के स्कूल जाने का समय अलग-अलग हो गया। इस लड़की के भाई और लड़के के बीच बारहवी तक दोस्ती अच्छी बनी रही। दोस्ती के कारण प्रेमप्रसंग का मामला अधर में छूटा रहा।
पर प्यार और पिंपल्स छुपाए नहीं छुपते। लड़की के भाई को उसके दोस्त और अपनी बहन के बीच प्रेमप्रसंग का पता चला। हालांकि दोनों की दोस्ती के दौरान प्रेमप्रसंग बेहोशी में ही रहा था। फिर भी शक का कोई इलाज होता है न कोई डॉक्टर बन सकता है। इस शक के कारण दोनों लड़कों की दोस्ती में दरार आई जो एक खाई में बदल गई। दोनों हाथ मिलाने वाले दोस्तों में लड़की के भाई ने अपने दोस्त पर हाथ उठाया। उसी दिन से दोस्ती का मौसम पतझड़ का हो गया और जमीं मरू हो गई।
उधर दोस्ती की जमीं मरू हुई लेकिन इधर प्रेमप्रसंग में मानो मानसून आ गया। लड़की ने फोन पर अपने प्यार को प्यार का इजहार किया। अब प्यार के मानसूनी बादल इस प्यार के रिश्ते को सींचते आगे बढ़ रहे थे। ये फुहारें दोनों को अच्छी लग रही थी। दोनों ने एकदूसरे को जाना और इसी बीच दोनों में अच्छीखासी नजदीकीयां बन गई।
लड़की घर वालों ने इस प्यार को अपने छद्म सामाजिक चहरे पर पिंपल समझा और इसे जड़ से मिटाना चाहा। पर प्यार का पिंपल जो इलाज से बढ़ता है और दबाने से फोड़ा बन जाता है। दिली चोट का ये मामला दबाने और रूढीवादी झोलाछाप इलाज से जख्म बनाता गया। लड़की के घर वालों ने अपने पुरूषवादी फॉर्मेट में लड़की के प्यार को सपोर्ट नहीं किया बल्कि ये तो वायरस मान लिया गया। पर इस वायरस के लिए ऐंटी वायरस तैयार करना मुश्किल काम है। फिर भी लड़की के परिवार ने ऐंटी वायरस तैयार कर इस प्रेमप्रसंग के ‘वायरस’ पर इस्तेमाल किया। हुआ ये कि घर की सारी पुरानी रूढ़िवादी, पुरूषप्रधान, अबला नारी टाइप की सारी सिस्टम फाइल्स में इस वायरस की घुसपैठ हुई और नए वर्जन की सिस्टम फाइल बनाने की कोशिश हुई।
पर इस कोशिश के सेटअप में मदरबोर्ड का एरर पहाड़ की तरह खड़ा हो गया। मदरबोर्ड याने लड़की की मां समाज के इंटरनेट की सारी पुरानी रूढ़िवादी, पुरूषप्रधान, अबला नारी टाइप की सारी सिस्टम फाइल्स को सपोर्ट करने वाली थी। पर लड़की इस इंटरनेट में 3जी की हिमायती थी। हुआ ये कि मदरबोर्ड ने लड़की की सारी सोशल नेटवर्किंग साइट्स को ब्लॉक कर दिया। अबला नारी वायरस से इस प्रेम के ‘वायरस’ पर हमला किया गया। इस वायरस और कई स्पेम्स से प्रेमप्रसंग को राइ से पहाड़ बना दिया गया। अब इस मदरबोर्ड पर प्यार से संबंधित कोई सॉफ्टवेयर या एप्लीकेशन चलना नामुमकिन था।
सिस्टम के सीपीयू में पिता की भूमिका माउस की थी पर वो माउस ही बन गया। परिवार के पूरे सिस्टम में लड़कों के लिए इंटरनेट की कोई भी वेबसाइट पर रोक नहीं थी चाहे वो साइट प्यार की हो या फिर सेक्स की। मदरबोर्ड ने लड़की को प्यार के ‘वायरस’ से पीड़ित मानकर उसकी सारी सोशल नेटवर्किंग, एजुकेशनल, ऐंटरटेनमेंट और लव साइट्स ब्लॉक कर दी। इसमें सिस्टम के माउस और कीबोर्ड का भी सपोर्ट रहा।
इतना ही नहीं लड़की को मानसिक और शारीरिक प्रताडना दी गई। उसके मर जाने को ‘वायरस’ से मुक्ति मिलने का एक मात्र उपाय तक कहा जाने लगा। लड़की ने अपना मानसिक स्थिरता और संयम भी खो दिया। उसे खाना खाने और बनाने से भी दूर कर दिया गया। कमरे में कैद लड़की घर की पुरूषसत्ता और उसकी दासी मातृसत्ता से खूब पिटती रही। लंबे समय तक ऐसा चलते रहने से लड़की ने आत्महत्या रास्ता अपनाने के प्रयास किये। पर उसे इसकी इजाजत भी नहीं थी।
आखिर वो अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं कर सकती थी। प्रताड़ना चरम पर थी लड़के और लड़की के बीच संपर्क को शून्य कर दिया गया था। इस कारण लड़के ने लड़की को एक मोबाइल खरीद कर दिया ताकि वो मानसिक रूप से संबल बनी रहे। लड़की को अपने जिस्म का फैसला खुद लिया और दोनों को मिले तो महिनों हो चुके थे। लड़की ने कई बार आत्महत्या के लिए अपने हाथ को काट लिया था। उसका कोमल शरीर पिटाई के घाव और दागों से पटता जा रहा था। हाथों पर कई बार हाथ कांटने के इतने निशान हो गए थे कि एक बार सरसरी नजर से देखने पर नहीं गिने जा सकते थे। अब लड़के का दिया मोबाइल भी लड़की से लौटा दिया गया।
प्रताड़नाओं की सारी हदें पार हो जाने पर लड़के ने लड़की के घर अपने पत्रकारीय संबंधों की मदद से पुलिस भेज दी। घरेलू हिंसा का मामला बनाने की सोची। पर पुलिस इन मामलों में हाथ खड़े कर देती है। घरेलू हिंसा कानून जैसे कई आधुनिक कानूनों के असल दुश्मन तो पुलिस खुद ही है। लड़की के पापा के रुतबे, पैसे आदि के सामने पुलिस ने सरेंडर कर दिया। आगे उलटा लड़के के घर पुलिस भेजी पर लड़के घरवालों ने पुलिस और लड़की के घरवालों का कड़ाई से सामना किया। लड़के के घर का सिस्टम नए वर्जन का था। लड़की की मां ने लड़के के घर का तीन-चार बार विजिट किया। लड़की के पापा और चाचा वगैरह तो लड़के के घर पहले ही पुलिस लेकर पहुंच चुके थे। लड़की भाई ने भी लड़के और अपनी बहन को कई गीदड़ भबकियां देने में कसर नहीं छोड़ी।
आखिरकार इस ‘वायरस’ पर कोई एंटी वायरस हथकंडे विफल होते देख ब्रम्हअस्त्र का इस्तेमाल किया गया। अपने जीवन के 19 वसंत भी न देख पाइ उस लड़की की शादी कर देने का फैसला परिवार ने ले लिया। इस फैसले में न तो लड़की की भागीदारी थी न कोई रजामंदी। लड़के की सलामती की दुहाई देकर जबरन शादी का फैसला लड़की पर लाद दिया गया। इस दौरान लड़का अपने प्रेमप्रसंग के इस मोड़ पर अकेला होने के कारण कुछ करने में असमर्थ हो गया।
कई मानसिक शारीरिक दबाव बनाकर लड़की से 8-10 साल बड़े लड़के से उसकी शादी जबरन कर दी गई।
Friday, May 20, 2011
Thursday, April 7, 2011
Wednesday, April 6, 2011
मैं जेएनयू गया, वहां पर्चें बंट रहे थे जिसमें ये लिखा था-
गांजे की चीलम से निकलकर देख जालिम
सरफरोशों का वतन है यह मुर्दों का बाज़ार नहीं।
प्रियंका, सुभाष, रवि, पूजा, मनोज(जेएनयू)
दोस्तों बधाई हो.. आखिरकार 28 सालों बाद ही सही, भारत ने फिर से विश्वकप जीत लिया है। इस जीत में सभी भारतीयों ने अपना योगदान दिया है। चाहे वो घर में रहकर टीवी देखते हुए हो या स्टेडियम में पैसे खर्च कर।
जेएनयू के छात्रों ने भारतीय टीम का बढ़िया समर्थन किया। तमाम तरह की घटिया राजनीति के बाद भी वो लोग वामपंथियों के बहकावे में नहीं आये। बल्कि दुगने उत्साह और जोश-ओ-खरोश से गंगा-चंद्रभागा से लेकर ब्रम्हपुत्र हॉस्टल तक को गुंजायमान कर दिया। ये होना भी चाहिए भई। ऐसा मौका रोज-रोज थोड़े आता है? तो सभी हिंदुस्तानियों ने इस जश्न के माहौल में तह-ए-दिल से शिरकत की। टीम ने विश्व में राष्ट्र का नाम रोशन किया है इसलिए देश अपने अपने तरीके से खुश हो रहा है।
साबरमती-ताप्ती हॉस्टल से जब चंद हिंदुस्तानी पाकिस्तानी समर्थकों को बाहर किया तो ये बात इन्हें नागवार गुजरी। भई वो चंद पाकिस्तानी समर्थक ही तो मुसलमान थे बाकी कोई थोड़े ही थे? ये वामपंथी इस बात को सब के सामने लाना ही नहीं चाहते कि उन्हें बाहर करने वाले 6 छात्र हमारे मुसलमान भाई ही थे जिनके सीने में हिंदुस्तानी दिल धड़कता है। आखिर क्यों कोई हिंदुस्तानी पाकिस्तानी को सपोर्ट करना चाहेगा और वो भी हिंदुस्तान के खिलाफ? इन्ही चंद पाकिस्तानी समर्थकों की वजह से एक पूरी कौम बदनाम हो सकती थी। मगर नहीं, ये वामपंथी एक हिंदुस्तानी मुस्लिम को हिंदुस्तानी क्रिकेट टीम के समर्थन करते हुए नहीं देख पाते। इनकी समझ में भारतीय संविधान ने इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Expression) तो दिया है पर मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties) इन्हें पाकिस्तान की सरकार ने दी है। वो भी ये कि जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो। ये गुण तो उन्हें विरासत में मिला हुआ है। अरे ये तो यह भी भूल जाते है कि एक कुत्ता भी इनसे वफादार होता है जो कम से कम जहां खाता है वहीं की रखवाली करता है। ना कि घर आये हुए चोरों को लालटेन दिखाता है। (1962- चीन के आक्रमण के समय ये वामपंथी इसी मुगालते में खुश हो रहे थे कि चीन इन्हें ‘liberate’ करने आ रहा है..)
अब बात करें राष्ट्रवाद और अतिवाद या अन्य..-वाद की (‘Jingoism, Exteremism or any other..-ism) की जोकि ऑस्ट्रेलिया-पाकिस्तान-श्रीलंका पर विजय प्राप्त करने के बाद हिंदुस्तानियों ने प्रदर्शित किया। अगर पूरा देश एक क्रिकेट मैच में जीत का जश्न मनाने सड़कों पर निकल जाता है तो क्या ये राष्ट्रवाद है? अतिवाद है? क्या जिस प्रकार भारत में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए वैसे पाकिस्तान में भारत जिंदाबाद कहा जा सकता है?
क्या वंदे मातरम् और भारतमाता की जय कहने मात्र से सांप्रदायिकता का खतरा मंडराने लग जाता है? क्या जय श्री राम और जो बोले सो निहाल के नारों से अल्पसंख्यकों को खतरा महसूस होने लगता है? क्या हमारा सामाजिक ढांचा इतना कमजोर है? दुनिया के सारे देशों में किसी न किसी रूप में अपनी मातृभूमि की पूजा की जाती है। हां पूजा-इबादत के तरीके अलग हो सकते है और इसमें बुरा क्या है। मगर ये भ्रमित वामपंथी भूल जाते है कि हिंदुस्तान की आबादी में हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी सारे सम्मलित है। यहां दिन की शुरुआत अजान और आरती के साथ होती है। ये वो देश है जहां की बहुसंख्यक हिंदू जनता एक इसाई औरत को अपना नेता चुनती है। और वो देशहित में एक सिक्ख के हाथ में बागडोर सौंप देती है। जिसे एक मुस्लिम राष्ट्रपति शपथ दिलाते है। अतः वामपंथी जिनका खुद ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बहुसंस्कृतिवाद, धर्मनिरपेक्ष और विपक्ष (Freedom of Expression, Multiculturalism and Opposition ) में विश्वास नहीं है। वे हम भारतीयों को सामाजिकता का पाठ ना पढ़ाए?
ये इस बात को भलीभांति जानते है कि इसकी प्रोगेसिव डेमोक्रेटिक पॉलिटिक्स और ये सारी हवाबाजी सिर्फ हिंदुस्तान मे और वो भी जेएनयू में ही चल सकती है। नॉर्थ गेट के बाहर एक अलग दुनिया है। जो इनके प्रपंचों को खूब जानती है। वहां इनके पुरेक अमेरिकन कॉर्पोरेट वर्ल्ड का अभिन्न हिस्सा बन चुके है। लेवाइज (Levis) की जींस पहनते है और हुंदई (Hyundai) की गाडियों में चलते है। और ऐसी इमारतों में काम करते है जिनकी दिवारों के पार छत्तीसगढ़-ओडिशा के आदिवासियों की चीखें नहीं पहुंच पाती है। बहुत शान से ये नक्सली आंदोलनों को अपना समर्थन देते है। कोई यह आंकड़ों में ये गिन कर बताए कि सालाना बजट 1800 करोड़ रुपए से अधिक का है इसमें उन मजलूम आदिवासियों के कल्याण के निमित्त कितने पैसे खर्चे है? कितने स्कूल बनाए है? कितनी कल्याणकारी योजनाएं बनाइ है? अब भई, ये सब तो सरकारी आरटीआइ की जद से बाहर है वरना इनके मानस-पुत्रों को भी पता चले कि जिनके पद-चिन्हों पर ये चल रहे है वहां कितना घोटाला है? सब सत्ता का खेल है भई। हाथ में सत्ता आते ही काहे के गरीब, काहे के आदिवासी?? कोई हमें बता दे कि नेपाल में माओवादियों की सरकार बने कितने समय बीत गए, कितने पिछड़े-शोषितों एवं कुचले हुए लोगों का कल्याण किया माओवादियों ने?
एक बार फिर से हम आम छात्र इन सभी कैपसवासियों का तहेदिल से शुक्रिया अदा करते है जिन्होंने तमाम वामपंथी प्रपंचों के बाद भी टीम इंडिया की हौसला अफजाइ की और जीत के बाद एक झंडे के तले आकर खुशी जाहिर की। हम अपने पथभ्रष्ट वामपंथियों का भी आव्हान करते हि कि वो चीनी गुलामी छोड़ के देश हित में सोंचे कम से कम हिंदुस्तानी नमक का हक अदा करें क्योंकि...
जो भरा नही है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं।
हृदय नहीं वो पत्थर, जिसमें स्वदेश का प्यार नही।। (दिनकर)
हृदय नहीं वो पत्थर, जिसमें स्वदेश का प्यार नही।। (दिनकर)
Thursday, March 31, 2011
RTI आरटीआइ
मैंने RTI का वीडियो बनाया है.
ये आइआइएमसी के ग्रुप-C ने अपने सोशल एडवर्टाइजिंग में शामिल किया है।
Tuesday, March 29, 2011
Wednesday, March 16, 2011
HumLog हमलोग IIMC Delhi HJ by Amit Pathe
HumLog हमलोग IIMC Delhi HJ by Amit Pathe
जल्दबाजी में बना ये वीडियो.
जिस तरह एग्जाम की तैयारी पिछली रात को होती है उसी तरह ये वीडियो हमलोग (एलुमिनाइ मीट) की पिछली रात को बनाया था। शाम को वीडियो बनान तय हुआ और रात के दो बजे बन गया।
सुबह पांच बजे तक वीडियो तैयार हो गया। मैंने संभवतः सभी के फोटो सभी के फोटो शामिल करने का प्रयास किया है। फोटो रेंडमली सिलेक्ट की गई है। काफी लोग छूट गए है ऐसी सभी त्रुटियों के लिए क्षमा करें।
Monday, February 28, 2011
Sunday, February 20, 2011
www.mediasaathi.com- मीडिया फ्लॉवर
www.mediasaathi.com पर आया मेरा इंटरव्यू-
http://www.mediasaathi.com/cat gory_other_right.php?cat=carto on
http://www.mediasaathi.com/cat .php?id=8
http://www.mediasaathi.com/cat
http://www.mediasaathi.com/cat
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