IIMC Delhi HJ हम लोगOut
Journalist by nature. Occasional FBवाला writer, rarely photographer, 6 day designer & one day Bachelor.
Friday, May 20, 2011
Thursday, April 7, 2011
Wednesday, April 6, 2011
मैं जेएनयू गया, वहां पर्चें बंट रहे थे जिसमें ये लिखा था-
गांजे की चीलम से निकलकर देख जालिम
सरफरोशों का वतन है यह मुर्दों का बाज़ार नहीं।
प्रियंका, सुभाष, रवि, पूजा, मनोज(जेएनयू)
दोस्तों बधाई हो.. आखिरकार 28 सालों बाद ही सही, भारत ने फिर से विश्वकप जीत लिया है। इस जीत में सभी भारतीयों ने अपना योगदान दिया है। चाहे वो घर में रहकर टीवी देखते हुए हो या स्टेडियम में पैसे खर्च कर।
जेएनयू के छात्रों ने भारतीय टीम का बढ़िया समर्थन किया। तमाम तरह की घटिया राजनीति के बाद भी वो लोग वामपंथियों के बहकावे में नहीं आये। बल्कि दुगने उत्साह और जोश-ओ-खरोश से गंगा-चंद्रभागा से लेकर ब्रम्हपुत्र हॉस्टल तक को गुंजायमान कर दिया। ये होना भी चाहिए भई। ऐसा मौका रोज-रोज थोड़े आता है? तो सभी हिंदुस्तानियों ने इस जश्न के माहौल में तह-ए-दिल से शिरकत की। टीम ने विश्व में राष्ट्र का नाम रोशन किया है इसलिए देश अपने अपने तरीके से खुश हो रहा है।
साबरमती-ताप्ती हॉस्टल से जब चंद हिंदुस्तानी पाकिस्तानी समर्थकों को बाहर किया तो ये बात इन्हें नागवार गुजरी। भई वो चंद पाकिस्तानी समर्थक ही तो मुसलमान थे बाकी कोई थोड़े ही थे? ये वामपंथी इस बात को सब के सामने लाना ही नहीं चाहते कि उन्हें बाहर करने वाले 6 छात्र हमारे मुसलमान भाई ही थे जिनके सीने में हिंदुस्तानी दिल धड़कता है। आखिर क्यों कोई हिंदुस्तानी पाकिस्तानी को सपोर्ट करना चाहेगा और वो भी हिंदुस्तान के खिलाफ? इन्ही चंद पाकिस्तानी समर्थकों की वजह से एक पूरी कौम बदनाम हो सकती थी। मगर नहीं, ये वामपंथी एक हिंदुस्तानी मुस्लिम को हिंदुस्तानी क्रिकेट टीम के समर्थन करते हुए नहीं देख पाते। इनकी समझ में भारतीय संविधान ने इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Expression) तो दिया है पर मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties) इन्हें पाकिस्तान की सरकार ने दी है। वो भी ये कि जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो। ये गुण तो उन्हें विरासत में मिला हुआ है। अरे ये तो यह भी भूल जाते है कि एक कुत्ता भी इनसे वफादार होता है जो कम से कम जहां खाता है वहीं की रखवाली करता है। ना कि घर आये हुए चोरों को लालटेन दिखाता है। (1962- चीन के आक्रमण के समय ये वामपंथी इसी मुगालते में खुश हो रहे थे कि चीन इन्हें ‘liberate’ करने आ रहा है..)
अब बात करें राष्ट्रवाद और अतिवाद या अन्य..-वाद की (‘Jingoism, Exteremism or any other..-ism) की जोकि ऑस्ट्रेलिया-पाकिस्तान-श्रीलंका पर विजय प्राप्त करने के बाद हिंदुस्तानियों ने प्रदर्शित किया। अगर पूरा देश एक क्रिकेट मैच में जीत का जश्न मनाने सड़कों पर निकल जाता है तो क्या ये राष्ट्रवाद है? अतिवाद है? क्या जिस प्रकार भारत में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए वैसे पाकिस्तान में भारत जिंदाबाद कहा जा सकता है?
क्या वंदे मातरम् और भारतमाता की जय कहने मात्र से सांप्रदायिकता का खतरा मंडराने लग जाता है? क्या जय श्री राम और जो बोले सो निहाल के नारों से अल्पसंख्यकों को खतरा महसूस होने लगता है? क्या हमारा सामाजिक ढांचा इतना कमजोर है? दुनिया के सारे देशों में किसी न किसी रूप में अपनी मातृभूमि की पूजा की जाती है। हां पूजा-इबादत के तरीके अलग हो सकते है और इसमें बुरा क्या है। मगर ये भ्रमित वामपंथी भूल जाते है कि हिंदुस्तान की आबादी में हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी सारे सम्मलित है। यहां दिन की शुरुआत अजान और आरती के साथ होती है। ये वो देश है जहां की बहुसंख्यक हिंदू जनता एक इसाई औरत को अपना नेता चुनती है। और वो देशहित में एक सिक्ख के हाथ में बागडोर सौंप देती है। जिसे एक मुस्लिम राष्ट्रपति शपथ दिलाते है। अतः वामपंथी जिनका खुद ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बहुसंस्कृतिवाद, धर्मनिरपेक्ष और विपक्ष (Freedom of Expression, Multiculturalism and Opposition ) में विश्वास नहीं है। वे हम भारतीयों को सामाजिकता का पाठ ना पढ़ाए?
ये इस बात को भलीभांति जानते है कि इसकी प्रोगेसिव डेमोक्रेटिक पॉलिटिक्स और ये सारी हवाबाजी सिर्फ हिंदुस्तान मे और वो भी जेएनयू में ही चल सकती है। नॉर्थ गेट के बाहर एक अलग दुनिया है। जो इनके प्रपंचों को खूब जानती है। वहां इनके पुरेक अमेरिकन कॉर्पोरेट वर्ल्ड का अभिन्न हिस्सा बन चुके है। लेवाइज (Levis) की जींस पहनते है और हुंदई (Hyundai) की गाडियों में चलते है। और ऐसी इमारतों में काम करते है जिनकी दिवारों के पार छत्तीसगढ़-ओडिशा के आदिवासियों की चीखें नहीं पहुंच पाती है। बहुत शान से ये नक्सली आंदोलनों को अपना समर्थन देते है। कोई यह आंकड़ों में ये गिन कर बताए कि सालाना बजट 1800 करोड़ रुपए से अधिक का है इसमें उन मजलूम आदिवासियों के कल्याण के निमित्त कितने पैसे खर्चे है? कितने स्कूल बनाए है? कितनी कल्याणकारी योजनाएं बनाइ है? अब भई, ये सब तो सरकारी आरटीआइ की जद से बाहर है वरना इनके मानस-पुत्रों को भी पता चले कि जिनके पद-चिन्हों पर ये चल रहे है वहां कितना घोटाला है? सब सत्ता का खेल है भई। हाथ में सत्ता आते ही काहे के गरीब, काहे के आदिवासी?? कोई हमें बता दे कि नेपाल में माओवादियों की सरकार बने कितने समय बीत गए, कितने पिछड़े-शोषितों एवं कुचले हुए लोगों का कल्याण किया माओवादियों ने?
एक बार फिर से हम आम छात्र इन सभी कैपसवासियों का तहेदिल से शुक्रिया अदा करते है जिन्होंने तमाम वामपंथी प्रपंचों के बाद भी टीम इंडिया की हौसला अफजाइ की और जीत के बाद एक झंडे के तले आकर खुशी जाहिर की। हम अपने पथभ्रष्ट वामपंथियों का भी आव्हान करते हि कि वो चीनी गुलामी छोड़ के देश हित में सोंचे कम से कम हिंदुस्तानी नमक का हक अदा करें क्योंकि...
जो भरा नही है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं।
हृदय नहीं वो पत्थर, जिसमें स्वदेश का प्यार नही।। (दिनकर)
हृदय नहीं वो पत्थर, जिसमें स्वदेश का प्यार नही।। (दिनकर)
Thursday, March 31, 2011
RTI आरटीआइ
मैंने RTI का वीडियो बनाया है.
ये आइआइएमसी के ग्रुप-C ने अपने सोशल एडवर्टाइजिंग में शामिल किया है।
Tuesday, March 29, 2011
Wednesday, March 16, 2011
HumLog हमलोग IIMC Delhi HJ by Amit Pathe
HumLog हमलोग IIMC Delhi HJ by Amit Pathe
जल्दबाजी में बना ये वीडियो.
जिस तरह एग्जाम की तैयारी पिछली रात को होती है उसी तरह ये वीडियो हमलोग (एलुमिनाइ मीट) की पिछली रात को बनाया था। शाम को वीडियो बनान तय हुआ और रात के दो बजे बन गया।
सुबह पांच बजे तक वीडियो तैयार हो गया। मैंने संभवतः सभी के फोटो सभी के फोटो शामिल करने का प्रयास किया है। फोटो रेंडमली सिलेक्ट की गई है। काफी लोग छूट गए है ऐसी सभी त्रुटियों के लिए क्षमा करें।
Monday, February 28, 2011
Sunday, February 20, 2011
www.mediasaathi.com- मीडिया फ्लॉवर
www.mediasaathi.com पर आया मेरा इंटरव्यू-
http://www.mediasaathi.com/cat gory_other_right.php?cat=carto on
http://www.mediasaathi.com/cat .php?id=8
http://www.mediasaathi.com/cat
http://www.mediasaathi.com/cat
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Friday, February 18, 2011
देश भर की नदियों का पानी..
महानगर की आपाधापी वाली जिंदगी से कुछ मिनटों की दूरी पर। गोबर से लिपी दीवारें, उनके ऊपर घास-फूस के बने छप्पर, लोक गीतों की धुनों और ढोलक की थाप पर थिरकते कदम के साथ चौपाल में देशी सांस्कृतिक के कार्यक्रम भी। ऐसा लगता है मानो हिन्दुस्तान की आंचलिक और लोक संस्कृति जीवन्त हो, बोल उठी हो। यह दृश्य किसी गांव का नहीं बल्कि दक्षिणी दिल्ली से सटी अरावली पहाड़ियों की कंदराओं में बसे सूरजकुंड के ऐतिहासिक मेले का है। यह मेला ऐसा है जो देश-विदेश की सांस्कृतिक गतिविधियों को मंच प्रदान करता है।
यहां समूची भारतीय संस्कृति का विश्व संस्कृति से होता मिलन, दुनिया के देशों की आपसी सीमाओं और उन पर उपजे तनाव को बेमानी साबित कर रहा था। वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को सामने देखना एक सुखद पल था। मेले में लगे विभिन्न राज्यों के स्टॉल भारत की हस्तशिल्प विरासत का झरोखा दिखा रहे थे। साथ ही संपूर्ण भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में पिरोने के गवाह भी बन रहे थे। आंध्र प्रदेश की मुख्य थीम पर फरीदाबाद में सजा सांस्कृतिक सूरजकुंड मेला लगातार 25वें वर्ष हमारे बीच है।
ऊबड़-खाबड़ जमीन पर मिट्टी से लीपी गई झोपड़ियों के बीच रंग-बिरंगे परिधानों में घूमते लोक-कलाकार। ये एक छोटा भारत होने का भ्रम पैदा करते हैं। यही खासियत है हरियाणा के लिए अकेले साठ फीसदी राजस्व पैदा करने वाले सूरजकुंड मेले की। यहां आप मराठी धुनों पर थिरक सकते हैं, आंध्र की रामायण मण्डली को सुन सकते हैं साथ ही आइडैंटिटी कार्ड लटकाए रावण के साथ फोटो खिंचवा सकते हैं। आप अगर खाने के शौकीन हैं तो गुजराती खाखरा के साथ के साथ कुल्हड़ वाली चाय और राजस्थान की दाल-बाटी-चूरमा चट करने के बाद मटका कुल्फी का मजा ले सकते हैं।
अपने 25वें बसंत के इस अनूठे मेले की थीम है आंध्रप्रदेश। हैदराबाद, विजयबाड़ा और वारंगल से सौ से अधिक दुकानों ने राज्य के हस्त शिल्प मूर्तिकला और लजीज पकवानों से लोगों का मन मोह रहे थे। साथ ही वहां से आई कला मंडलियों ने मेले में घूम-घूमकर मेला-आगंतुकों को वहां की परंपरा एवं लोक-कलाओं से लोगों का परिचय करवाया। आगंतुकों के लिए राज्य का प्राचीन डप्पू डोस और तड़प गिल्लू नृत्य आकर्षण का केंद्र बने रहे। तेलगू भाषा से अनजान होते हुए भी उत्तर-भारतीय दर्शकों को इन कलाकारों ने अपनी भाव-भंगिमाओं और अनूठी प्रस्तुति से बांधे रखा। आंध्रप्रदेश पर्यटन विभाग के सहायक निदेशक जी0 राम कुट्टैया और हरियाणा सरकार के पर्यटन मंत्री ओम प्रकाश जैन मेले की सफलता को लेकर खासे उत्साहित हैं। मेले के प्रभारी राजेश जून ने बताया कि कई मामलों में यह मेला अन्य मेलों से अलग है। देश और विदेश से आये विभिन्न सैलानी पूरे भारतवर्ष की सांस्कृति छंटा को एक साथ, एक मंच पर देख सकते हैं। रामाकुट्टैया का कहना है कि इस मेले में आंध्रप्रदेश की सभ्यता, संस्कृति और ग्रामीण परिवेश को उकेरा गया है। जिसमें आंध्रप्रदेश के शाकाहारी लजीज पकवान बड़ा हिस्सा अदा कर रहे है।
दरअसल यह मेला और हस्तशिल्प दोनों एक दूसरे के पर्याय जैसे ही हैं। जिससे यह मेला अपनी रचनात्मक हस्तशिल्प सामग्री के लिए विख्यात है। लेकिन पिछले कुछ सालों से हस्तशिल्प खरीददारी के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है। मेले में मधुबनी चित्रकारी की एकमात्र दुकान सजाए बैठी गीता देवी पिछले छह साल से लगातार अपनी चित्रकारी के साथ मेले में शामिल होती हैं। वे कहती हैं- “आई काइल लोग सब चित्रकारी के बजाय त् खूब करै छतिन् पर कोए खरीदे नय छै। (आने वाले लोग चित्रकारी की बढ़ाई तो खूब करते है पर कोई खरीदता नहीं है।) पहले से आब खर्चा बढ़ गैले ये तै लेके दामों बढ़ गैले थे।(खर्च अब पहले से बढ़ गया है इसलिए दाम बढ़ गए थे।) आब कि कहब बाबू बड़ाय से पेट ते नहिये भरै छै।(अब क्या कहे बाबू बढ़ाई से तो पेट नहीं भरता है)।“
वहीं दूसरी तरफ उजबेकिस्तान से आयी लीजा पहली बार भारत आकर बहुत खुश हैं। अब तो यहॉ उनके काफी दोस्त भी बन गए हैं। लीजा की तरह उनकी सहेलियों को भी भारत की संस्कृति में अपनापन महसूस होता है। सात तरह की संस्कृतियों का एक ही नृत्य में मिल जाना उजबेकिस्तान की सांस्कृतिक समृद्धता को दर्शाता है। मेले में उजबेकिस्तान आयोजन में भागीदार है इसके अलावा विभिन्न देश अपनी-अपनी कला संस्कृति की छटा बिखेरने मेले में आये हुए हैं। देशी और विदेशी संस्कृति के मिलन से इस मेले में चार चांद लग गए है।
इसी तरह सार्क देशों के स्टॉलों के बीच हस्तकृतियों की खुबसूरती को निहारती, जर्मनी से आई जेनिफर ने सूरजकुंड मेले को ‘इनक्रिडिबल’ और ‘वन्डरफुल’ जैसे शब्दों में बयां किया। उनका कहना था कि मैं भारत पहली बार आई हूं, लेकिन इस मेले में आकर भारत की अद्भुत संस्कृति और कला को देखकर अब मुझे लग रहा है कि मानों मैं भारत को बहुत करीब से जानती हूं। इसी संबंध में पिछले दस सालों से यहां आ रहे दिल्ली के सुरेश का कहना है कि रजत वर्ष होने के अवसर पर मेले में इस बार एक अलग ही नजारा है। इस बार सुरक्षा और पार्किंग की व्यवस्था भी पिछले सालों से बेहतर है। उनता यह भी कहना है कि मेला हस्तशिल्पियों को अपनी कला को प्रदर्शित करने का एक बेहतरीन मंच देता है।
झोपड़ियों जैसी दुकान राजस्थानी जूतियों से सजी है। खरीददारों की भीड़ के बीच दुकानदार एक साथ कई लड़कियों को जूतियों की कारीगरी और भाव बता रहा है। ज्यादातर ग्राहक आ रहे हैं, दाम पूछ रहे हैं और आगे के स्टॉल की तरफ रुख कर ले रहे हैं। खरीदने वाले बहुत कम है। राजस्थान के दूरदराज के गांव से जूतियां बेचने आए विक्रम कहते है ‘‘ मैं पांच सालों से यहां दुकान लगा रहा हूं। ज्यादातर लोग आते हैं और मोलभाव कर चले जाते हैं जबकि शहर की बड़ी दुकानों में लोग इन्हीं जूतियों के लिए हंसी-खुशी कहीं ज्यादा रकम अदा करते हैं।
जहां एक ओर सूरजकुण्ड मेला विभिन्न राज्यों कर दुकानों से सजा था वहीं दूसरी ओर यहां पर भ्रमण करने वाले दर्शकों का उत्साह भी चरम पर था। दो सालों से सूरजकुण्ड मेला में आ रहे गाजियाबाद के कुलदीप सिंह कहते है कि इस बार बांस से बने हस्तशिल्प के सामानों में ज्यादा विविधता नजर आई। वहीं फरीदाबाद की गुंजन को मेले का आकर्षण दक्षिण भारतीय व्यंजनों का रोचक स्वाद लगा। वहीं विदेशी पर्यटकों ने में सूती कपड़ों की जमकर खरीददारी की। स्वीडन की अमांडा लुकास कहती है कि इस मेले में पूरे भारत की झलक देखने को मिलती है। मैंने यहां पर सूती के कपड़ों की खरीददारी की जो हमारे देश में नहीं मिलता है। साथ ही बांस से निर्मित कई घरेले सामानों की खरीददारी की जिनके मूल्य काफी सामान्य ही लगे।
सारे देश के शिल्पकार यहां मौजूद हैं, मानो देश भर के प्रांतों का पानी इस सूरजकुंड में हो। पर यहां पचास रूपये की एक जलेबी भी है। आमलोगों को मेले में घूमना तो भा रहा है पर यहां भी मंहगाई डायन उनकी नाक में दम कर रही है। इस पर मेला प्रबंधन समिति के अधिकारी निरंजन दास कहते है कि यह सही है कि यहां चीजे काफी मंहगी हैं। देश के दूरदराज क्षेत्रों से शिल्पकार यहां हस्तशिल्प लेकर आए हैं। इन चीजों के दाम में बड़ा हिस्सा परिवहन खर्च का है जो चीजें मंहगी होने की बड़ी वजह है। श्री दास फिर भी मानते है कि हस्तशिल्प के कद्रदान ज्यादा दाम चुकाकर भी चीजें खरीदते है। हर आगंतुक खरीदारी न भी करे पर इस मेले में उन्हे देश की शिल्प कला और संस्कृति के दर्शन हो रहे हैं। यहां मनोरंजन के लिए भी बहुत कुछ है। इस तरह यहां हर आगंतुक के लिए कुछ न कुछ जरूर है। मेले में आए लोग पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था से भी संतुष्ट दिखे। चप्पे-चप्पे पर कैमरे और पुलिसकर्मी है। प्रबंधन समिति ने एक उद्घोषणा केन्द्र भी बनाया जो आगंतुकों और दुकानदारों के लिए सहयोगी साबित हो रहा है।
मेले की इस चहलकदमी के दूसरी ओर सीड़ियों की शक्ल में झील के लिए चाहारदीवारी बनाकर सटाएं गऐ सफेद-पीले और काले पत्थरों के बीच झील सूख चुकी है। सूखी झील में बरसात के पानी ने अटककर जो छोटी-छोटी झीलें बनाई हैं, वहां बच्चों का एक झुंड कागज की नावें चला रहा है। हवा ठहरे पानी में धीमे-धीमे नावों को ढकेलती है। वक्त ने ऐसे ही सूरजकुण्ड के इस मेले को पिछले पच्चीस सालों से आगे बढ़ाया है। अगले साल फिर से लोगों को इस मेले का इन्तजार रहेगा और इसका भी कि ये मेला अपना स्वर्ण वसंत भी पूरा करे।
Tuesday, February 8, 2011
Monday, February 7, 2011
Wednesday, February 2, 2011
Monday, January 31, 2011
Saturday, January 29, 2011
Tuesday, January 25, 2011
Saturday, January 22, 2011
किताबों से सच्ची दोस्ती में खाई
मैं स्कूल में था। टाटपट्टी वाले स्कूल में। जहां टाटपट्टियां भी फटी ही होती थी। मम्मी-पापा ने हिन्दी स्कूल को ही प्राथमिकता दी थी। क्योंकि उस समय वहां आज की तरह अंग्रजी में पढ़ने का ‘चलन’ नहीं था। मम्मी साक्षर है पापा नहीं। उन्होंने अपनी ओर से हमारी अच्छी शिक्षा और पालन-पोषण के भरपूर प्रयास किए है। जब मुझमें समझदारी आई तो महसूस हुआ कि अंग्रेजी स्कूल में पढ़ना ज्यादा अच्छा है। वहां किताबें ज्यादा अच्छी पढ़ाई जाती है।
यह समय आते-आते देर हो चुकी थी। अब तो हिन्दी किताबें ही पढ़नी थी। पापा कोयला खदान में मजदूर है। इसलिए महंगी अंग्रेजी किताबों वाले स्कूल में पढ़ाना उनके लिए आर्थिक रूप से भी संभव न था। हम दो भाई एक बहन है। सिर्फ दीदी के लिए नई किताबें खरीदी जाती थी। दीदी के बाद भईया और फिर मैं भी उन्हीं किताबों से पढ़ते थे।
पापा के पास पुश्तैनी धन भी नहीं है। दादाजी का पेशा किसानी ही है। पापा का कभी ‘इन’ किताबों से वास्ता नहीं हुआ। किताबें पढ़ने के लिए स्कूल में उनका नाम तो दर्ज हुआ था पर दूसरे के खेत में बंधुआ मजदूरी करनी पडती थी तो.... कभी उनका किताबों से क, ख, ग... भी नहीं पढ़ा। पर अपने बच्चों को अपने सामर्थ्य कहीं ज्यादा पढ़ा रहे है। आय का एक मात्र साधन कोयला खदान की नौकरी, उन्हें अपने बच्चों को महंगी अंग्रेजी किताबों वाले स्कूल में पढ़ाने में असमर्थ कर देती थी। तो हमने हमारी हिन्दी भाषा की किताबें ही पढ़ी।
हाईस्कूल तक घर में कभी कोई अखबार, पत्रिका या कॉमिक्स नहीं आई। तो नॉवेल और बाकी साहित्य तो दूर की कौड़ी थी। उस समय तक तो सिर्फ स्कूल की उन्हीं हिन्दी की किताबों से वास्ता रहा जो मध्य प्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम की थी। और ये किताबें मेरे जन्म के समय से हाईस्कूल में पहुंचने तक नहीं बदली थी। निहायती नीरस और गुजरे समय की ये किताबें कभी मेरी सच्ची दोस्त नहीं बन सकी।
मैं कॉलेज में जनसंचार की पढ़ाई करने देवी अहिल्या विश्वविधालय इंदौर गया। बहुत सुन रखा था किताबों के ‘मंदिर’ लाइब्रेरी के बारे में यहां जीवन में पहली बार लाइब्रेरी का मुंह देखा। किताबों की इस दुनिया में किताबें और मैं एक-दूजे को अजनबी महसूस कर रहे थे क्योंकि हम दोनों का कभी ‘ठीक से’ परिचय नहीं हुआ था।
लाइब्रेरी की किताबों से परिचय करना शुरू किया। पर मैं अंग्रेजी किताबों से कोशिशों के बाद भी दोस्ती नहीं कर पाया। वजह थी हमारे बीच भाषा की खाई। बचपन से अब तक से बिल्कुल उलट इंसानों से दोस्ती के इतर किताबों को सच्ची दोस्त बनाने की भरसक कोशिशें की। पर बचपन की आदतें जाते-जाते ही जाती है। अंग्रेजी किताबों से ‘दोस्ती’ न हो पाते देख हिन्दी किताबों को अपने करीब लाया। किताबों को अपना ठीक-ठाक दोस्त बना लिया।
पीजी करने दिल्ली आया। तब आइआईएमसी की लाइब्रेरी में मेरी नई-नई दोस्त ‘हिन्दी किताबों’ की गिनती बहुत कम पाई। जो थी वो लाइब्रेरी में एक तरफ चुपचाप दुबके हुए थी। मैंने इन किताबों से अपनी दोस्ती को आगे बढ़ाया। पर इस दौरान पता चला कि हिन्दी और अंग्रेजी किताबों की दोस्ती में बड़ा अंतर है। हिन्दी किताबों से दोस्ती किसी पांचवी पास व्यक्ति से दोस्ती की तरह है। जबकि अंग्रेजी किताबों से दोस्ती किसी पीएचडी किए व्यक्ति से दोस्ती के बराबर है।
आज जब मैं आइआईएमसी के पुस्तक मेले में खड़ा था अपने आप को अजनबीयों के बीच पा रहा था। मेरी दोस्त हिन्दी किताबें यहा भी एक तरफ चुपचाप दुबके हुए थी। वहीं अंग्रेजी की किताबें सर उठाकर दंभ भर रही थी।
मैंने प्रदर्शनी में चारों तरफ नजर घुमाई और प्रदर्शनी के हॉल से बाहर आ गया। मेरे मन में ये विचार कौंध रहा था कि मेरी हिन्दी विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। पर निराशा की बात है कि लाइब्रेरी में मेरा दोस्त हिन्दी किताबों की संख्या दयनीय स्तर तक कम है। और वे वहां चुपचाप दुबके हुए ही रहती है।
हालांकि मैं हिन्दी किताबों को अपना सच्चा दोस्त नहीं बना पाया हूं। पर हमारी दोस्ती समय के साथ गहरी और सच्ची होती रही है। अब साथ ही साथ मैं अंग्रेजी किताबों से भी संवाद करना चाहता हूं ताकि वो मुझे बिल्कुल अजनबी ना लगे। आशा करता हूं मेरी सच्ची दोस्त हिन्दी किबातों की संख्या तेजी से बढ़े। मेरी हमसाथी के साथ मेरी दोस्ती सच्ची, निरंतर और सक्रीय रहे।
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