'कविता मैं नहीं लिखता वो तो भीतर से कोई लिख जाता है, गीत स्वयं शब्दों में उतर आते हैं। मैं बहुत पढ़ता हूं, मनन करता हूं। यही इस उम्र में भी मेरी तेज याददाश्त का राज है।' यह कहना है 88 वर्षीय पद्मभूषण गीतकार, कवि गोपालदास नीरज का। मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के सम्मान समारोह में शिरकत करने शहर आए 'नीरज' से सिटी भास्कर की विशेष बातचीत के अंश... 'लिखे जो खत तुझे...', 'ऐ भाई जरा देख के चलो...', 'फूलों के रंग से...', जैसे कई दिलकश गीतों के रचयिता 'नीरज' ने कहा, मुझे भी हमेशा विवादास्पद माना गया, कोई मुझे निराशावादी समझता है, कोई भोगवादी तो कोई सुरवादी। मैंने लिखा, 'हम तो इतने बदनाम हुए इस जमाने में यारों सदियां लग जाएंगी हमें भुलाने में..।' (हंसते हुए) फिर जो विवादास्पद होता है वही लोकप्रिय होता है। मैं कवि त्रिमुखी पीड़ा का : मैं त्रिमुखी पीड़ा का कवि हूं। शरीर की पीड़ा रोगी रहने के कारण मैंने भोगी। तन रोगी रहा बचपन से। जब भूख लगती थी तो खाने के लिए पैसा नहीं था और जब पैसा हुआ तो भूख खत्म हो गई। प्रेम की पीड़ा भोगी। जिससे प्रेम किया वो मिला नहीं, वो मिले जिनसे प्रेम नहीं हो सका। तीसरे अकेलेपन के कारण अपने भीतर प्रवेश किया तो आत्मा की एकांतता का पता चला। मैंने कहा 'तन रोगी, मन भोगी मेरी आत्मा योगी रे..।' यानी त्रिमुखी पीड़ा, शरीर की पीड़ा, मानसिक पीड़ा व आत्मा की पीड़ा का कवि कहो।लोकप्रियता भागी मेरे पीछे-पीछे मैं ये मानता हूं कि बिना कष्ट उठाए बिना संघर्ष किए कोई भी मंजिल प्राप्त नहीं होती। बचपन में मेरे पिता की मृत्यु हो गई। तभी से मेरा संघर्ष शुरू हो गया। तभी से दूसरे के घर रहने के लिए चला गया। 10 साल वहां रहा। सो अकेलापन रहा, तो अंतर्मुखी हो गया। अंतर्मुखी होने पर एक दिन अपने आप कविता फूट गई। कविता लिखना शुरू कर दिया। मैंने गाते सुना कवि सम्मेलन में, मुझे लगा कि इससे अच्छा तो मैं गा लेता हूं। मैंने गाना शुरू कर दिया और लोकप्रिय होने लगा। लोकप्रियता तो मेरे पीछे-पीछे भागती रही। हरिवंशराय बच्चन की 'निशा निमंत्रण' पढ़कर मैंने कविता लिखनी शुरू की। उनसे ही मैंने प्रेरणा ली थी। लिखता हूं शुद्ध कविताएं मैं तो शुद्ध कविता लिखता हूं। शुद्ध कविता में जीवन के बहुत से आयाम आते हैं। कहीं आशा है, कहीं निराशा भी..., जीवन है तो मृत्यु भी..., कहीं जय, कहीं पराजय है, कहीं सुख है तो कहीं दुख है..। संसार का रूप ही द्वंद्वमय है। शेक्सपियर से एक बार किसी ने पूछा कि आप ट्रेजडी के साथ कॉमेडी क्यों लिखते हैं? तो उन्होंने कहा, 'आई वांट टू होल्ड मिरर अप टू दी नेचर।' इसमें ट्रेजडी भी है और कॉमेडी भी। अर्थ जीवन का उद्देश्य नहीं ग्लोबलाइजेशन के युग में कविताएं भी ग्लोबल हो रही हैं। इस युग में अर्थ भी जरूरी है। पर यह जीवन का माध्यम है लेकिन उद्देश्य नहीं हो सकता। अर्थ जरूरी है पर अर्थ के पीछे पागल होकर दौडऩा मूर्खता है। एसडी बर्मन मैलोडी किंग एसडी बर्मन के साथ मैंने काम किया था। शंकर जय किशन, रोशन, मदन मोहन से भी जुड़ा रहा। पर एसडी बर्मन साहब ने जिस तरह मेरे गीत बनाए वैसा किसी और ने किया हो, मुझे लगता नहीं। वो नए-नए प्रयोग करते थे। मैंने भी नए-नए प्रयोग किए भाषा के। मुझे अपना सबसे ज्यादा पसंद है गीत 'फूलों के रंग से, दिल की कलम से...'। इसकी विशेषता ये है कि इसमें अंतरा पहले है मुखड़ा बाद में। ये एक एक्सपेरिमेंटल गीत था। एसडी बर्मन मैलोडी किंग थे। सहज के लिए भाषा सहज मेरी भाषा के प्रति लोगों की शिकायत रही कि न तो वह हिंदी है और न उर्दू। उनकी यह शिकायत सही है और इसका कारण यह है कि मेरे काव्य का जो विषय 'मानव प्रेम' है उसकी भाषा भी इन दोनों में से कोई नहीं है। हृदय में प्रेम सहज ही अंकुरित होता है और वह जीवन में सहज ही हमें मिलता है। जो सहज है उसके लिए सहज भाषा ही अपेक्षित है।
'पुण्य देवता, पाप पशु प्रेम बनाता है आदमी'
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Journalist by nature. Occasional FBवाला writer, rarely photographer, 6 day designer & one day Bachelor.
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Friday, February 24, 2012
कवि गोपालदास 'नीरज' से रूबरू... 'तन रोगी मन भोगी मेरी आत्मा योगी रे'
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